हालांकि संजीवनी नाम की कोई बूटी है भी या नहीं इसे लेकर आयुर्वेदाचार्यों के अलग-अलग मत हैं, कुछ संजीवनी नाम की किसी बूटी के अस्तित्व से ही इंकार करते हैं और कुछ का ये मानना है, कि जो बूटी जीवन दे दे वही संजीवनी है, बाबा रामदेव और बालकृष्ण ने तो कई साल पहले संजीवनी बूटी को खोज लेने का दावा किया था, बालकृष्ण इस संजीवनी को पेटेंट तक कराने का दावा सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं, अब सवाल ये उठता है कि जिस संजीवनी को रामदेव पहले ही खोज चुके हैं उस संजीवनी को राज्य सरकार द्वारा दुबारा खोजने के लिए इतना बड़ा अभियान चलाने का क्या मतलब है ?, क्या बाबा रामदेव का संजीवनी को खोज लेने का दावा झूठा है या फिर सरकार का मकसद कुछ और ही है ।
उत्तराखंड के जिस आयुष विभाग को संजीवनी खोजने का काम सौंपा गया है उस विभाग के मुखिया भी संजीवनी को लेकर सीधे- सीधे कोई बात नहीं कहते, वे कभी संजीवनी के समतुल्य बूटी की बात करते हैं और कभी संजीवनी की, वे त्रेता युग के बाद हजारों साल बीत जाने की बात कह कर खुद अपने विभाग द्वारा चलाये जाने वाले अभियान पर सवालिया निशान लगाते हैं लेकिन इतना सब होने के बावजूद वे उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संजीवनी को खोजने की बात कह रहे हैं । उत्तराखंड के आयुष विभाग ने संजीवनी को खोज लाने का दावा करने वाले बाबा रामदेव से इस बारे में कुछ सलाह ली या नहीं इस पर भी सब मौन हैं, ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या राज्य सरकार को भी कोई हिमालय में कोई संजीवनी मिलेगी या ये अभियान सिर्फ अभियान बन कर ही रह जायेगा ।
जिस संजीवनी ने भगवान लक्षमण के प्राण बचाये थे, जिस संजीवनी बुटी की खोज पवन पुत्र हनुमान ने की थी, उसी संजीवनी बुटी को खोजने के लिए उत्तराखंड सरकार का स्वास्थय महकमा जल्द निकल रहा है, स्वास्थय विभाग उत्तराखंड में ऊपरी इलाको के पर्वत पर संजीवनी सहित कई ऐसी जड़ी-बूटी खोजेगा जो दुर्लभ हो चुकी है और इलाज के लिए राम बाण हो सकती है। उसके लिए रावत सरकार ने केंद्र से बजट की गुहार भी लगायी थी लेकिन अब उत्तराखंड सरकार संजीवनी की खोजबीन का काम अपने ही संसाधनों के बूते करेगी ।
त्तराखंड सरकार ने संजीवनी बूटी को खोजने के लिए चलाये जा रहे इस अभियान के लिए पहले केंद्र सरकार से वित्तीय मदद मांगी थी लेकिन अब मुख्यमंत्री इस अभियान को अपने संसाधनों से चलाये जाने का दावा कर रहे हैं । स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी के मुताबिक भी सूबे में कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां है, जिनके महत्व को देखते हुए इन्हें संरक्षण दिए जाने की जरुरत है। नेगी भी ये मानते हैं की इस काम के लिए उन्होंने केंद्र से वित्तीय मदद की गुहार लगाई थी ।
संजीवनी एक वनस्पति का नाम है जिसका उपयोग चिकित्सा कार्य के लिये किया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम सेलाजिनेला ब्राहपटेर्सिस है और इसकी उत्पत्ति लगभग तीस अरब वर्ष पहले कार्बोनिफेरस युग से मानी जाती हैं। जानकर बताते है कि नमी नहीं मिलने पर संजीवनी मुरझाकर पपड़ी जैसी हो जाती है लेकिन इसके बावजूद यह जीवित रहती है और बाद में थोड़ी सी ही नमी मिलने पर यह फिर खिल जाती है।
यह पत्थरों तथा शुष्क सतह पर भी उग सकती है इसके इसी गुण के कारण वैज्ञानिक इस बात की गहराई से जाँच कर रहे है कि आखिर संजीवनी में ऐसा कौन सा जीन पाया जाता है जो इसे अन्य पौधों से अलग और विषेष दर्जा प्रदान करता है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी असली पहचान भी काफी कठिन है क्योंकि जंगलों में इसके समान ही अनेक ऐसे पौधे और वनस्पतियाँ उगती है जिनसे आसानी से धोखा खाया जा सकता है। मगर कहा जाता है कि चार इंच के आकार वाली संजीवनी लम्बाई में बढ़ने के बजाए सतह पर फैलती है।
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