कई दिनों से कश्मीर में अलगाववादियों के खिलाफ सेना की सख्त कार्रवाई से बौखलाई कांग्रेस पार्टी का दर्द आखिर कल संसद में उभर ही आया,कांग्रेसी नेता गुलाम नबी 'आजाद' ने जहाँ एक ओर अलगाववादियों के खिलाफ पैलेट्स गन के इस्तेमाल का विरोध किया वहीं दूसरी ओर बिना नाम लिये Z News पर भी निशाना साधा ये कहकर कि कुछ न्यूज चैनल्स इस्लाम के खिलाफ एजेंडा चला रहे हैं और तारिक फतह व तस्लीमा नसरीन जैसे लोग जो इस्लाम के खिलाफ जहर उगलते हैं उन्हें यह चैनल्स बढावा देते हैं इसलिये इन लोगों पर बैन व इन चैनल्स पर सरकार लगाम कसे।सबसे पहले तो मैं Z News को बधाई देता हूँ जिन्होंने कल के कल ही इस विषय पर डिबेट करा के कांग्रेस एवं आजाद साहब को करारा जवाब दे दिया,दूसरा इस बात के लिये भी बधाई देता हूँ कि इस्लाम में कट्टरपंथी वहाबिज्म विचारधारा जैसे विवादास्पद विषयों जिसे आईएसआईएस व तमाम आतंकी संगठन मानते हैं जैसे विषयों पर Z News उनकी तह तक जाकर ताल ठोक के खुली बहस करवा रहा है जिससे इस्लाम का सही स्वरूप दुनियाँ के सामने आ सके और विश्व में शांति स्थापित हो सके।
अब बात तारिक फतह,तस्लीमा नसरीन व इनके जैसे और तमाम लोगों की जिनके बारे में आजाद साहब बोलते हैं कि यह जहर उगलते हैं दरअसल सच तो यह है आजाद साहब कि ये लोग इस्लाम के खिलाफ नहीं बल्कि जहरीली विचारधारा के खिलाफ जहर उगलते हैं और जैसे कि एक पुरानी कहावत है कि "जहर ही जहर को मारता है" ठीक वैसे ही यह तमाम लोग इस्लाम को इस जहरीली विचारधारा से मुक्ति दिलाने का प्रयास कर रहे हैं,यह लोग इस्लाम के खिलाफ नहीं हैं यह इस बात से भी साबित होता है कि यह तमाम लोग अभी भी इस्लाम को ही अपनाये हुए हैं,विश्व भर में शांति स्थापित करने के कार्य में तारिक फतह,तस्लीमा नसरीन आदि लोग बेहतर भूमिका अदा कर रहे हैं इसलिये मेरी मोदीजी से अपील है कि जल्द से जल्द इन तमाम लोगों को बाइज्जत भारत की नागरिकता प्रदान करें साथ ही मजबूत सुरक्षा भी प्रदान करें जिससे यह देश के कोने-कोने में जाकर इस्लाम का सही स्वरूप लोगों को समझाने का कार्य कर सकें।
कल जो ज़ुल्म कश्मीरी मुसलमानों ने कश्मीरी पंडितों एवं सुरक्षा कर्मियों पर बरपाए थे उस समय किसी ने ऐसे भावात्मक लेख लिखे। शायद नहीं। होंगे तो शून्य के बराबर। अब राष्ट्र ऐसे लेख लिखने वालों से जानना चाहता है :--
*जिस देश में रहो उस देश के विरुद्ध नारेबाजी करना क्या उचित है?
*दूसरे देशों से मुठी भर चंद सिक्के लेकर भारत के सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंकना क्या उचित है?
*कश्मीरी पंडितों को मार-मार कर भगाना क्या उचित था?
*जब तक कश्मीरी पंडित घाटी से निकले नहीं उन पर हो रहे अत्याचारों पर क्यों चुप्पी साधे रहे?
*जब कश्मीरी पंडितों की महिलायों पर अत्याचार हो रहे थे, तब क्यों मौन धारण किये हुए थे?
*भारत में रहकर भारतीय सैनिकों पर पत्थर फेंकना क्या उचित है?
*भारत में रहकर “भारत मुर्दाबाद, पाकिस्तान ज़िन्दाबाद” नारे क्या उचित हैं?
*शुकवार को नमाज़ पढ़ने के लिए जमा होते हो या कि पाकिस्तान और आईएसआईएस के झंडे फहराने?
*भारत में रहकर “India Back” लिखने पर क्यों मौन रहे?
*ये पत्थरबाज़ी किसके कहने पर और किस लिए हो रही है?
*आतंकवादी के मारे जाने पर इतना सियापा क्यों?
*घरों में आतंकवादियों को कौन छिपा रखता है और क्यों?
*इतने वर्षों से बेगुनाहों से खून की होली कौन खेल रहा है?
सोशल मीडिया पर एक तर्क यह भी :-
आज भारत की आर्मी ने वह काम कर दिखाया, जिसके आगे इजराइल की मोसाद फ़ोर्स भी बौनी साबित हो गई. भारत की सेना ने मात्र तीन दिन के भीतर कश्मीर को घुटनों पर लाकर रख दिया. तीन दिन पैलेट की फायरिंग में मात्र ४३ पत्थरबाज मारे गए, और ७०० पत्थरबाजों ने अपनी आँखें हमेशा के लिए खो दी. मात्र ५०० रुपये के पत्थरबाज़ी के लिए इन जाहिलों ने लाखों कीमत की आँखों की रौशनी खो दी. अच्छा ही है जिन आँखों में भारत की नफरत का खून दौड़ता था, अब वो हमेशा के लिए बुझ गईं.
18 जुलाई की सुबह 'बीबीसी हिन्दी' पर श्रीनगर से रिपोर्टर माजिद_जहाँगीर का लेख पढा़। जहाँगीर लिखते हैं कि 'सेना के हमले में घायल लोगों के शरीर के ऊपरी हिस्सों पे गोलियाँ लगीं हैं और इससे साफ जाहिर है के सेना उन्हें मारना चाहती थी।' उनके अनुसार 'एक घायल लडके ने बताया कि वह तो दूध लेने निकला था, कुछ लोग पत्थरबाजी कर रहे थे, गोलियाँ चल रही थी, मुझे भी गोली मार दी।'
अब जहाँगीर साहब से कोई ये पूछे कि जब गोलियाँ चल रही हों, कर्फ्यू लगा हो, तब कौन गधा घर से दूध लेने निकलता है? और दूसरी बात, जब चारों और से लगातार सेना पर हमला हो रहा हो तो जवाबी कार्यवाही क्या सैनिक ये पूछ-पूछकर करें कि 'हाँ भाईसाहब! आप दूध लेने निकले हो या पत्थर मारने?? बता दीजिए, वो क्या है ना कि मुझे गोली चलानी है।' ?? जनाब, जब आप वार जोन में होते हैं तो गोलियाँ आपसे पूछने नहीं आतीं...
इस लेख का मतलब साफ है... इस लेख का मतलब वही है जो राजदीप का बुरहान को भगतसिंह बताने में होता है या जो रवीश का उसे बेचारा पोस्टर ब्वॉय बताने में होता है... बुरहान को उसके कुकर्मों की सजा देने वाले सैनिकों पर एफआईआर दर्ज करने की माँग करने वाली कविता_कृष्णन् और कश्मीर को भारत से अलग देश घोषित करने वाली अरुन्धती_रॉय और उसी जमात के दूसरे वामपंथी_कॉमरेड्स का जो मन्सूबा है, वही इस लेख का भी है... और इन सब का एक ही मकसद है घाटी में चल रही सैनिक कार्यवाही को गलत ठहराना, सेना को अत्याचारी, हिंसक, क्रूर साबित कर सैनिकों का मनोबल तोडना और बुरहान जैसे कमीनों को नायक सिद्ध करके उनके अनुयायियों का मनोबल बढाना...
घाटी में सेना के ऑप्रेशन पर चल रही प्रतिक्रियाओं को देखिए... कैसे मीडिया सेना को विलेन सिद्ध करने पर तुला हुआ है?... रातों रात यू.पी. के किसी अमरनाथ यात्री का वीडियो आता है, जो बोल रहा है कि 'हमारी बस खाई में गिर गई, सेना के लोग मदद को नहीं आए, फिर मुसलमान अपनी नमाज छोडकर हमारी मदद को आगे आए।'...... और ये वीडियो आते ही मीडिया शुरु.... सब ये सिद्ध करने में लग जाते हैं कि 'सेना की कार्यवाही गलत है, सेना मासूमों को मार रही है, सैनिकों को कश्मीरियों से बातचीत करनी चाहिए, उनके दिलों में प्यार जगाना चाहिए, बिना वजह परेशान नहीं करना चाहिए.... और भी न जाने क्या-क्या???' इधर देश की राजधानी में जन्तर-मन्तर पर सेना_के_विरुद्ध_मार्च निकाला जाता है... जिसमें सेना की कार्यवाही को अमानवीय बताया जाता है, मानवाधिकारों की दुहाई दी जाती है, बुरहान वानी जैसे आतंकियों को ये अहसास दिलाया जाता है कि 'तुम लगे रहो, तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड सकता, कुछ हुआ तो हम हैं ना।'
इन छद्म मानवतावादियों से कोई पूछे कि 'क्या सेना का कोई मानवाधिकार नहीं है?? कहाँ जाती है इनकी मानवता, जब इनके घोषित इन्सानियत के पुजारी देश की रक्षा करने वाले वीर सैनिकों पर पत्थर व आग के गोले बरसाते हैं, सेना की गाडियाँ तोडते हैं, जलाते हैं... कभी समझेंगे ये उन सैनिकों का दर्द, जो तपती धूप में पूरा-पूरा दिन चौराहे पर ड्यूटी देते हैं और कोई पानी तक पूछने वाला नहीं होता... उनकी जगह खडे होकर देखिए, जब आपको ये तक न पता हो कि कब कोई बच्चा,बूढा, जवान आदमी या औरत कहीं से बम बाँधे आएगा और अपने साथ तुम्हें भी ले उडेगा.. जब आप किसी पर यकीन न कर सकते हों... जब आप दुश्मनों से लड रहे हों और आपके अपने कहे जाने वाले लोग ही उस समय आप पर पत्थर फेंक रहे हों, दुश्मन की मदद कर रहे हों, उसे बचा रहे हों... जब आप अपनी ही आँखों के सामने दुश्मन देश के झण्डे देखने को मजबूर हों, जब आप अपने ही देश की बर्बादी और दुश्मनों के जिन्दाबाद के नारे सुनने को अभिशप्त हों... तो बताइए जनाब! आपका खून खौलेगा या नहीं.... तब आप क्या करेंगे?? सामने वाले की आरती उतारेंगे या फिर उसकी आहुति देंगे?? क्या करेंगे आप???
सेना को क्रूर और हिंसक बताने वाले, अमानवीय घोषित करने वाले मानवता के पुजारियों! अगर भारतीय सेना क्रूर हुई होती तो कश्मीर की सारी बर्फ लाल हो चुकी होती... वहाँ घर तो होते पर आदमी नहीं दिखते.. और पत्थर तो छोडो किसी की घर से बाहर तक निकलने की हिम्मत ना होती, साँस तक पूछ पूछ के लेते वो तुम्हारे शान्तिदूत.... जनाब! ये भारतीय सेना की सहनशीलता है जो पत्थर, गाली सब सहके भी कश्मीर की सुरक्षा में दिन-रात डटी हुई है... आतंकियों से, दुश्मनों की गोलियों से और साथ-साथ कभी बाढ से, कभी भू स्खलन से हर आपदा से रक्षा करती है... अगर भारतीय सेना न हुई होती तो बाढ में बहके सारे शान्तिदूत हूरों और गिलमों की सेवाएँ ले रहे होते... पर उसके बाद भी सेना को क्या मिला??? पत्थर, गाली, आग के गोले, लाठी, डंडे और गोलियाँ...... तुम्हीं बताओ जनाब! कि इतना सब सहके भी, हर संकट में अपनी जान की बाजी लगाकर इनकी सुरक्षा करके भी, संकट के समय अपना राशन-पानी तक इन्हें देकर भी अगर आजतक सेना इनका प्यार पाने लायक नहीं हुई, इनका नजरिया बदलने में सफल नहीं हुई तो अब और सेना क्या करे????
जहाँगीर साहब अपने उस लेख में किसी घायल का बयान लिखते हैं कि उसने कहा कि 'बुरहान की मौत की खबर सुनके हमने सेना पर पत्थर फेंके और मुझे गोली लग गई पर अब कश्मीर का हल करके रहेंगे, अब पूछे नहीं हटेंगे।'
जनाब! हम भी यही कह रहे हैं कि अब पीछे नहीं हटना चाहिए, अब इसका हल होना ही चाहिए... क्योंकि कूटयुद्ध जितना लम्बा खिंचता है, दुश्मन की चाल उतनी सफल होती है। घाटी का संघर्ष एक कूटयुद्ध है, मन्त्रयुद्ध है या आज की भाषा में कहूँ, तो शीतयुद्ध है।
कश्मीर की वर्तमान परिस्तिथि से आप परिचित होंगें ही। “शहीद” बुरहान वनि के लिए कुछ “बुद्धिजीवी शुभचिंतक” अविलम्ब अपना शोक व्यक्त कर चुके हैं। उन्होंने भारतीय सरकार एवं जम्मू कश्मीर की सरकार को कटघरे में खड़ा कर के पूर्णतयः दोषी घोषित कर दिया है। उन्होंने यहाँ तक बोल दिया कि जनता की आवाज़ को बलपूर्वक दबाया जा रहा है। सेना और पुलिस सरकारी वेतनभोगी अत्याचारी हैं जिन्हें परपीड़ा में आनंद आता है। सीमा पार से भी जनता के विरोध को पुरज़ोर समर्थन मिल रहा है। अलगाववादी नेता निरन्तर विरोध के पक्ष में हैं।
दोस्तों, जब आतंकवादी, ईर्ष्यालु पड़ोसी, और देश में रह कर उसे ही तोड़ने वाले देशद्रोही एक सुर में राग अलापें, तो समझ लीजिए कि उनके खेमे में संकट के बादल मंडरा रहे हैं। बाकी आप खुद समझदार हैं। कुछ प्रश्न के उत्तर कश्मीर के लोगों को उनसे पूछने चाहिए जो उन्हें दंगों में जाने के लिए उकसाते हैं।
गत वर्ष जब कश्मीर में बाढ़ आई थी, बुरहान वनि ने कितने कश्मीरियों को बचाया था? जिस भारतीय सेना ने डूबते हुए कश्मीर को एक नयी साँस दी थी, बुरहान वनि उसी भारतीय सेना के विरुद्ध हमलों के लिए युवाओं को उकसाता था। क्या ये हमारे शहीद हैं? भारतीय सेना ने उसे मार गिराया, और हमें गर्व है अपनी सेना पर। भगवान् न करे कोई आपदा कश्मीर में आये, जिनपर पत्थर बरस रहे हैं, वही संकट मोचक बन कर सबसे आगे खड़े होंगें। इस विश्वास की पुष्टि मुझसे नहीं, किसी कश्मीरी से ही कर लीजिए।
कुछ लोग कश्मीर की परिस्तिथि का ठीकरा भारत के सर फोड़ते हैं, और UN Convention का हवाला देते हुए कहते हैं कि भारत ने अभी तक कश्मीरियों से मताधिकार क्यों नहीं करवाया। आप सबको शायद यह जान कर आश्चर्य हो, भारत चाह कर भी कश्मीर को लेकर जन मत नहीं ले सकता, क्योंकि UN Convention के अनुसार जन मत के लिए पाकिस्तान द्वारा ग़ुलाम बनाए कश्मीर से अपनी सेना हटाना पहला चरण है। इस बारे में कश्मीरियों को कौन गुमराह कर रहा है, और क्यों? भारत की ओर जो क्रोध उड़ेला जा रहा है, उसे सही दिशा देना चाहिए।
दुःख है कि जहाँ कश्मीर का एक युवा civil services में सर्वोच्च स्थान से उत्तीर्ण होता है तो वहीं दूसरा युवा हाथ में पत्थर उठा लेता है। युवाओं को यह निर्णय लेना पड़ेगा कि कौन से विकल्प से वो कश्मीर को बेहतर बना सकते हैं।
कश्मीर तो हमारा ही रहेगा। 1947 से इस विचार में कोई परिवर्तन नहीं आया, और न ही आएगा। 2004 में हमारे प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत की सीमाएँ परिवर्तित नहीं होंगी, आवत जावत के लिए सुविधा अवश्य दी जा सकती है। इस तथ्य को जितनी शीघ्रतापूर्वक स्वीकार करेंगे, उतना सभी के लिए अच्छा होगा।
हमारी सहायता करिये, कि हम आपकी सहायता कर सकें। सम्पूर्ण विश्व भारत का लोहा मान रहा है, और जानता है कि भविष्य में भारत का अति विशेष स्थान है।
क्या आप इस महागाथा का भाग बनेंगें? मेरी विनती है, भीड़ से निकलिए, अपना भविष्य स्वयं निर्धारित करिये।
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