आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
कर्नाटक के चुनाव परिणामों के बीच कांग्रेस और जेडीएस के बीच सरकार बनाने की कवायद जारी है, लेकिन इस बीच नया मोड़ आ रहा है। मीडिया सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि कुछ कांग्रेस के लगभग 15 लिंगायत विधायकों को कुमारस्वामी मुख्यमंत्री पद पर मंजूर नहीं है और वो ऐसी स्थिति होने पर बगावत भी कर सकते हैं।
कांग्रेस और जेडीएस के बीच अगर सरकार बनाने की कवायद होती है तो इन कांग्रेसी विधायकों को कुमारस्वामी मंजूर नहीं होंगे। बताया जा रहा है कि कांग्रेस के कुछ लिंगायत विधायकों ने कहा है कि वो पार्टी भी छोड़ सकते हैं।
इस घटनाक्रम के बाद कांग्रेस को सरकार बनाने की कोशिशों में अडंगा लग सकता है। हालांकि सरकार बनाने को लेकर कवायद अभी जारी है। वहीं कांग्रेस ने तोड़फोड़ से बचने के लिए योजना बनाई है और बताया जा रहा है कि कांग्रेस के सभी विधायकों को राज्य से बाहर भेजा जा सकता है ताकि वे किसी के संपर्क में नहीं रहे।
मुख्यमंत्री पद के दावेदार बीएस येदियुरप्पा ने कहा है कि चूंकि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है इसलिए उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया है और वो सदन में बहुमत पेश करेंगे। इसी बीच कांग्रेस ने जेडीएस को समर्थन देने का प्रस्ताव सामने रखा है जिसके बार जेडीएस के एचडी कुमारास्वामी भी राज्यपाल से मिलने राजभवन पहुंचे हैं। उन्होंने भी कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया है।
राज्यपाल से मुलाकात करने से पहले येदियुरप्पा ने कहा कि कांग्रेस जनमत का अपमान कर रही है।उन्होंने कहा कि कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस के पांच साल से कुशासन को नकार दिया है। चामुंडेश्वरी से सिद्धारमैया चुनाव हार चुके हैं। लोगों ने बदलाव के लिए मतदान किया है। हम कांग्रेस की आलोचना करते हैं। अमित शाह और मोदी जी के नेतृत्व में लोगों ने कांग्रेस मुक्त भारत के लिए मतदान किया है।
लिंगायत का दांव उल्टा पड़ा
| वीरप्पा मोइली, अश्विनी कुमार |
कर्नाटक विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने लिंगायत कार्ड खेलते हुए इसे अलग धर्म का दर्जा देने का ऐलान किया था। तब इसे कांग्रेस का बड़ा दांव कहा गया और माना जा रहा था कि इसके जरिये कांग्रेस दक्षिण भारत के इस राज्य में चुनाव बैतरणी पार कर लेगी, लेकिन नतीजे बिल्कुल उलट आए हैं, जिससे खुद कांग्रेस भी सदमे में है।
अब पार्टी के भीतर ही लिंगायत मुद्दे पर विरोध के सुर उभरने लगे हैं और पार्टी के नेता इसका शीर्ष नेतृत्व व सिद्धारमैया पर फोड़ रहे हैं। ये चुनाव से ठीक पहले द्वारा खेले गए लिंगायत कार्ड को गलत बता रहे हैं।अवलोकन करें:--
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली से लेकर अश्विनी कुमार ने भी इस मामले में कांग्रेस नेतृत्व के फैसले पर सवाल उठाए। मोइली ने साफ कहा कि कांग्रेस को चुनाव से ऐन पहले यह मुद्दा नहीं उठाना चाहिए था।
उन्होंने कहा कि यह दांव पार्टी को उल्टा पड़ गया। कांग्रेस के प्रदर्शन पर निराशा व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी अगर विकास या सामाजिक न्याय के मुद्दे पर चुनाव लड़ी होती तो नतीजे कुछ और हो सकते थे।
मोइली ने यह भी कहा कि लिंगायत मुद्दे पर पार्टी के भीतर भी सहमति नहीं थी। कई सदस्यों ने इससे असहमति जताई थी, लेकिन इन्हें अनसुना कर दिया गया। कुल मिलाकर, पार्टी लिंगायत मसले को सही तरीके से संभाल नहीं पाई और जातिगत समीकरणों का समुचित मैनेजमेंट नहीं कर पाई।
कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार ने भी इसी तरह की बात कही है। उन्होंने कहा कि हालांकि कोई एक कारण कांग्रेस की हार की वजह नहीं बना, पर इस मुद्दे ने अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि हम कर्नाटक और देश की जनता के साथ सही तरीके से जुड़ नहीं पाए। लगता है कि लिंगायत का फैसला उल्टा पड़ गया।'
I think we could not establish emotional connect with the people of Karnataka and the country. Perhaps the Lingayat decision rebounded, no one single reason is responsible for defeat of the Congress: Ashwani Kumar, Congress #KarnatakaElections2018
2014 लोकसभा चुनावों के बाद से कांग्रेस की कार्यशैली का अवलोकन करने पर निष्कर्ष निकलकर आता है कि तुष्टिकरण पुजारी कांग्रेस कितनी अधिक हिन्दू विरोधी है। महात्मा गाँधी से लेकर अब राहुल गाँधी तक जिसे देखो हिन्दुओं को अपमानित एवं विभाजित करने का कोई मौका नहीं चूके। महात्मा गाँधी "रघुपति राघव राजा राम" आरती में "ईश्वर अल्लाह तेरो नाम" जोड़ने का साहस कर सकते थे, लेकिन अज़ान अथवा किसी इस्लामिक आयत में किसी हिन्दू देवी अथवा देवता का नाम जोड़ने का नहीं। महात्मा गाँधी द्वारा हिन्दू संस्कारों में हस्तक्षेप को आज तक कांग्रेस एवं इसके समर्थक दल समाजवाद के नाम पर कहीं आरक्षण के नाम पर तो कहीं जाति के नाम पर हिन्दुओं को विभाजित करने का काम करते आ रहे हैं। जबकि हिन्दुओं से कहीं अधिक जाति भेदभाव मुस्लिम एवं ईसाई समाज में हैं। हिन्दुओं में मृतक का, चाहे वह किसी भी जाति अथवा समुदाय से हो एक ही शमशान घाट पर दाह-संस्कार होता है, किसी भी त्यौहार पर एक ही मन्दिर में दर्शन करने जाते हैं, जबकि मुस्लिम एवं ईसाई समाज में ऐसा नहीं। किसी ने बदलाव करने की सोंची? बोलना तो दूर सोंच भी नहीं सकते, क्योंकि वोट बैंक पर खतरे के बादल मंडराने लगते हैं।
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