मुख्य चुनाव आयुक्त एके ज्योति अपने रिटायरमेंट से पहले सारे पेंडिंग केस को खत्म करना चाह रहे हैं, इसलिए आयोग फटाफट पुराने मामलों का निपटारा कर रहा है. वह 22 को रिटायर हो जाएंगे. हालांकि सत्ताधारी पार्टी का कहना है कि चुनाव आयोग इसका फैसला नहीं कर सकता, इसका फैसला अदालत में किया जाना चाहिए. सदस्यता रद्द करने की रिपोर्ट पर EC ने कहा, "सिफारिश अभी विचाराधीन है। राष्ट्रपति को हमने क्या सिफारिश भेजी है, इस पर अभी कमेंट नहीं करेंगे।" कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि EC ने राष्ट्रपति से इन विधायकों की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की है। चुनाव आयोग ने 21 विधायकों को नोटिस जारी किया था। एक विधायक जरनैल सिंह ने पंजाब से चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था। इस वजह से केस 20 विधायकों के खिलाफ था। बता दें कि अरविंद केजरीवाल सरकार ने इन विधायकों को संसदीय सचिव अप्वाइंट किया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने ही 8 सितंबर 2016 को 21 विधायकों के संसदीय सचिवों के तौर पर अप्वाइंटमेंट को रद्द कर दिया था।
आप पार्टी की दिल्ली सरकार ने मार्च 2015 में 21 विधायकों को संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया जिसको लेकर प्रशांत पटेल नाम के वकील ने लाभ का पद बताकर राष्ट्रपति के पास शिकायत करते हुए इन विधायकों की सदस्यता खत्म करने की मांग की थी. हालांकि विधायक जनरैल सिंह के पिछले साल विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद इस मामले में फंसे विधायकों की संख्या 20 हो गई है.
इस मामले में शिकायत करने वाले प्रशांत पटेल ने कहा कि यह पूरी तरह से साफ है, इन 20 विधायकों की सदस्यता रद्द हो जाएगी. उन्होंने कहा, “मैंने यह मामला 2015 में उठाया था, पूरे केस को देखने पर लगता है कि इन विधायकों की सदस्यता चली जाएगी. चुनाव आयोग अपना फैसला राष्ट्रपति के पास भेजेगा, जिस पर राष्ट्रपति अपनी मंजूरी देंगे.”
उन्होंने आगे कहा, “आप विधायकों की सदस्यता बचने की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि खुद दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव ने आयोग को दिए अपने हलफनामा में माना है कि विधायकों को मंत्रियों की तरह सुविधा दी गई. दिल्ली में 7 विधायक मंत्री हो सकते हैं, लेकिन इन्होंने 28 बना दिए.”
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने विधायकों को संसदीय सचिव बनाए जाने के फैसले का विरोध करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में आपत्ति जताई और कहा था कि दिल्ली में सिर्फ एक संसदीय सचिव हो सकता है, जो मुख्यमंत्री के पास होगा. इन विधायकों को यह पद देने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है.
संविधान के अनुच्छेद 102(1)(A) और 191(1)(A) के अनुसार संसद या फिर विधानसभा का कोई सदस्य अगर लाभ के किसी पद पर होता है तो उसकी सदस्यता जा सकती है. यह लाभ का पद केंद्र और राज्य किसी भी सरकार का हो सकता है.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप सरकार की ओर से उसके 21 विधायकों को संसदीय सचिवों के रूप में नियुक्त करने के आदेश को खारिज कर दिया था। वहीं, केंद्र सरकार ने संसदीय सचिवों की नियुक्ति का विरोध किया था। केंद्र ने कहा था कि मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव पद के अलावा इस पद का न तो संविधान में कोई स्थान है और न ही दिल्ली विधानसभा (अयोग्यता निवारण) कानून 1997 में। मंत्रालय ने न्यायालय से कहा था कि इस तरह की नियुक्ति कानून सम्मत नहीं है। सीएम अरविंद केजरीवाल के निर्णय को निरस्त करने की मांग करते हुए एक गैर-सरकारी संगठन ने जनहित याचिका दायर की थी। याचिका पर न्यायालय ने केंद्र को नोटिस दिया था, जिसके जवाब में गृह मंत्रालय ने एक हलफनामा दायर कर सरकार का पक्ष रखा था।
विधायकों के पास संसदीय सचिव का पद था
- चुनाव आयोग कह चुका है कि इन विधायकों के पास 13 मार्च 2015 से 8 सितंबर 2016 के बीच जाहिर तौर पर संसदीय सचिव का पद था।
- कानून के मुताबिक, दिल्ली में कोई भी विधायक रहते हुए लाभ का पद नहीं ले सकता।
- कानून के मुताबिक, दिल्ली में कोई भी विधायक रहते हुए लाभ का पद नहीं ले सकता।
क्या है मामला?
- दिल्ली विधानसभा में 70 में से 67 सीटों पर आम आदमी पार्टी के विधायक चुनकर आए थे। 13 मार्च 2015 को केजरीवाल सरकार ने अपने 21 विधायकों को पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी अप्वाइंट किया था।
- राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के प्रेसिडेंट रवींद्र कुमार ने दिल्ली हाईकोर्ट में इन अप्वाइंटमेंट्स के खिलाफ पिटीशन दायर की थी। कुमार का कहना था कि ये अप्वाइंटमेंट्स गैरकानूनी हैं। सीएम के पास ऐसी नियुक्तियाें का अधिकार नहीं है।
- दिल्ली के एक एडवोकेट प्रशांत पटेल ने 19 जून 2015 को प्रेसिडेंट के पास पिटीशन फाइल की थी। इसमें विधायकों की बतौर पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी नियुक्ति को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट (लाभ के पद) का मामला बताया था। पटेल ने इन 21 MLAs की मेंबरशिप रद्द करने की मांग की थी।
- राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के प्रेसिडेंट रवींद्र कुमार ने दिल्ली हाईकोर्ट में इन अप्वाइंटमेंट्स के खिलाफ पिटीशन दायर की थी। कुमार का कहना था कि ये अप्वाइंटमेंट्स गैरकानूनी हैं। सीएम के पास ऐसी नियुक्तियाें का अधिकार नहीं है।
- दिल्ली के एक एडवोकेट प्रशांत पटेल ने 19 जून 2015 को प्रेसिडेंट के पास पिटीशन फाइल की थी। इसमें विधायकों की बतौर पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी नियुक्ति को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट (लाभ के पद) का मामला बताया था। पटेल ने इन 21 MLAs की मेंबरशिप रद्द करने की मांग की थी।
कब बिल लाई थी सरकार?
- इन अप्वाइंटमेंट्स पर विवाद बढ़ने के बाद दिल्ली सरकार 23 जून, 2015 को दिल्ली असेंबली में ऑफिस ऑफ प्रॉफिट एक्ट में अमेंडमेंट बिल लाई। इसे बिना बहस के पास करा लिया गया।
- बिल पास करा कर 24 जून 2015 को इसे लेफ्टिनेंट जनरल नजीब जंग के पास भेज दिया गया।
- बिल पास करा कर 24 जून 2015 को इसे लेफ्टिनेंट जनरल नजीब जंग के पास भेज दिया गया।
इसके बाद क्या हुआ?
- एलजी ने इस अमेंडमेंट बिल को प्रेसिडेंट के पास भेजा। प्रेसिडेंट ने इलेक्शन कमीशन से राय मांगी। इलेक्शन कमीशन ने पिटीशन लगाने वाले एडवोकेट से अपना जवाब दाखिल करने को कहा।
- जवाब में प्रशांत पटेल ने 100 पेज का जवाब दिया और बताया कि मेरे पिटीशन फाइल किए जाने के बाद असंवैधानिक तरीके से बिल लाया गया। इलेक्शन कमीशन एडवोकेट के जवाब से संतुष्ट हुआ। इसके बाद प्रेसिडेंट ने बिल लौटा दिया।
- जवाब में प्रशांत पटेल ने 100 पेज का जवाब दिया और बताया कि मेरे पिटीशन फाइल किए जाने के बाद असंवैधानिक तरीके से बिल लाया गया। इलेक्शन कमीशन एडवोकेट के जवाब से संतुष्ट हुआ। इसके बाद प्रेसिडेंट ने बिल लौटा दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
सितंबर 2016 के अपने फैसले में हाईकोर्ट ने इन अप्वाइंटमेंट्स को रद्द कर दिया।कोर्ट ने अपने ऑर्डर में कहा कि नियमों को ताक पर रख कर ये अप्वाइंटमेंट्स किए गए थे।
ऑफिस ऑफ प्रॉफिट क्या होता है?
- कॉन्स्टिट्यूशन के आर्टिकल 102 (1) (ए) के तहत सांसद या विधायक ऐसे किसी और पद पर नहीं हो सकता, जहां अलग से सैलरी, अलाउंस या बाकी फायदे मिलते हों।
- इसके अलावा आर्टिकल 191 (1)(ए) और पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव एक्ट के सेक्शन 9 (ए) के तहत भी ऑफिस ऑफ प्रॉफिट में सांसदों-विधायकों को अन्य पद लेने से रोकने का प्रोविजन है।
- संविधान की गरिमा के तहत ‘लाभ के पद’ पर बैठा कोई व्यक्ति उसी वक्त विधायिका का हिस्सा नहीं हो सकता।
- इसके अलावा आर्टिकल 191 (1)(ए) और पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव एक्ट के सेक्शन 9 (ए) के तहत भी ऑफिस ऑफ प्रॉफिट में सांसदों-विधायकों को अन्य पद लेने से रोकने का प्रोविजन है।
- संविधान की गरिमा के तहत ‘लाभ के पद’ पर बैठा कोई व्यक्ति उसी वक्त विधायिका का हिस्सा नहीं हो सकता।
दिल्ली में अभी क्या स्थिति?
- कुल सीट: 70
- AAP: 66
- BJP: 4
- बहुमत के लिए जरूरी: 36
- अगर 20 विधायकों की सदस्यता रद्द भी हो जाती है तो केजरीवाल सरकार को कोई खतरा नहीं है। बहुमत से सरकार के पास 10 विधायक ज्यादा रहेंगे।
- हालांकि चुनाव आयोग को असेंबली की इन 20 सीटों पर चुनाव कराने होंगे।
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