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‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगान बनने योग्य नहीं, ‘आनंदमठ’ एक इस्लाम-विरोधी किताब :कर्नाटक के संगीतकार TM कृष्णा ने उगला जहर

                                        कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा (साभार: Youtube)
कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा अपने राजनीतिक बयानों को लेकर अक्सर विवादों में रहते हैं। हाल ही में उन्होंने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ और हिंदुओं को लेकर विवादित बातें कही हैं। अपनी किताब का प्रचार करने के लिए यूट्यूब चैनल ‘द देशभक्त’ को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने वंदे मातरम्, आनंदमठ और हिंदू पहचान के लेकर अपनी नापसंदगी खुलकर जाहिर की।

‘वंदे मातरम्’ प्रसिद्ध भारतीय लेखक और उपन्यासकार बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था। इसे उन्होंने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में प्रस्तुत किया था। यह उपन्यास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और बंगाल में पडे अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित है।

‘वंदे मातरम्’ शब्द स्वतंत्रता सेनानियों के बीच एक लोकप्रिय नारा बन गया था। ब्रिटिश शासन के समय, जब देश कठिन दौर से गुजर रहा था, तब इससे उन्हें प्रेरणा और शक्ति मिलती थी। यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के अपने देश के प्रते गहरे प्रेम को दर्शाता है, जिसे वे ‘माँ’ के रूप में पूजते थे और उसे गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के उनके संकल्प को भी व्यक्त करता है।

वंदे मातरम में भारत माता को हिंदू देवी के रूप में दर्शाया: टीएम कृष्णा

हालाँकि, टीएम कृष्णा इस गीत के भक्ति भाव को पूरी तरह समझने में असफल हैं और इसे ‘जटिल’ बताते हुए कहते हैं कि यह देश का राष्ट्रगान बनने के योग्य नहीं था। वे कहते हैं, “बहुत साफ शब्दों में कहूँ तो वंदे मातरम का राष्ट्रगान कभी हो ही नहीं सकता था, क्यों वंदे मातरम् एक जटिल गीत है…।”

इसके बाद वे अपनी आलोचात्मक राय को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। वे गीत की संरचना में कमी निकालते हैं और यह भी बताते हैं कि चटर्जी ने इस गीत को एक ही बार में नहीं, बल्कि अलग-अलग चरणों में लिखा था। मानो यही बात इस गीत को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किए जाने से अयोग्य ठहराने के लिए पर्याप्त हो।

वो नोबेल पुरस्कार विजेता रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिए गए भारतीय राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की तुलना ‘वंदे मातरम्’ से करते हैं। जहाँ दोनों गीत अलग-अलग दृष्टिकोण से भारत का गुणगान करते हैं, वहीं कृष्णा का दावा है कि ‘वंदे मातरम’ की तुलना में ‘जन गण मन’ के लिए अधिक उपयुक्त है। वे ‘वंदे मातरम्’ को हिंदू पहचान से जोड़कर देखते हैं और उसे उसी दायरे तक सीमित मानते हैं, जिससे उन्हें स्पष्ट रूप से घृणा करते हैं।

इसके अलावा, वे ‘वंदे मातरम्’ के अंतिम कुछ ‘स्वर’ या भाव में बदलाव की ओर ध्यान खींचते हैं। उनका कहना है कि इन अंतरों में भारत माता को एक ‘हिंदू देवी’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसे लेकर भी उन्हें इस गीत से आपत्ति है।

‘आनंदमठ’ एक मुस्लिम-विरोधी किताब है: टीएम कृष्णा

टीएम कृष्णा की हिंदू-घृणा यही नहीं रुकती, बल्कि वे किताब ‘आनंदमठ’ को लेकर भी झूठ और भ्रामक दावे करने लग जाते हैं। कृष्णा दावा करते हैं कि उन्होंने ‘आनंदमठ’ के दो अनुवाद पढ़े हैं, और उसे पढ़ने से पता लगा कि यह किताब केवल तत्कालीन सरकार की विरोधी ही नहीं, बल्कि मुस्लिम-विरोधी भी है।

कृष्णा का कहना है, “इस किताब में यह गीत हिंदू सन्यासियों द्वारा गाया जाता है, जब वे उन गाँवों पर हमला कर रहे होते हैं, जहाँ मुस्लिम रहते हैं। यह किताब हिंदू समुदाय की श्रेष्ठता स्थापित करती है और उनके नियंत्रण के फिर से लौटने की आवश्यकता को दिखाती है।”

क्या कोई कह सकता है कि एक ‘कलाकार’ होने के नाते कृष्णा को गीत की ‘संरचना’ या उसके ‘स्वर’ को लेकर अपनी राय रखने का अधिकार है। लेकिन गीत की संरचना की आलोचना से आगे बढ़ते हुए वे इस पर व्यापक और सामान्य आरोप लगाने लगते हैं। वे गीत की प्रशंसा और समर्थन करने वाले लोगों को एक तरह के समूह या पंथ के रूप में पेश करते हैं।

वे कहते हैं, और दिलचस्प बात यह है कि जो लोग आमतौर पर ‘वंदे मातरम्’ का समर्थन करते हैं, वही लोग ‘समान नागरिक संहिता’ की बात भी करते हैं, ‘एक भाषा’ की बात भी करते हैं। उनमें से कुछ यह भी कहते हैं कि संविधान की प्रस्तावना में भगवान का उल्लेख होना चाहिए और ‘धर्मांतरण विरोध’ की भी बात करते हैं।

टीएम कृष्ण और उनकी हिंदू-घृणा

जब टीएम कृष्ण लगातार गीत की आलोचना करते रहते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि उन्हें असल में गीत से नहीं, बल्कि उस बड़ी सोच से परेशानी है, जिसका प्रतीक वे इस गीत को मानते हैं। वे कहते हैं “तो अगर आप देखें, तो वंदे मातरम् उस पूरी सोच का प्रतीक है, जिसे वे भारत मानते हैं, एक हिंदू भारत, एक प्रभुत्व वाला हिंदू भारत, जिसमें दूसरों को तभी जगह दी जा सकती है, जब वे भावनात्मक रूप से अदीन रहें या यह मान लें कि हमारे पूर्व हिंदू थे।”

ऊपर कोट कृष्णा के बयानों से यह साफ हो जाता है कि उनके गुस्से और कटुता का असली निशाना न तो ‘आनंमठ’ है और न ही ‘वंदे मातरम्’, बल्कि वह हिंदू पहचान है, जिसे वे इन दोनों से जोड़ते हैं। कृष्णा अपनी हिंदू-विरोधी सोच को देश की ‘धर्मनिरपेक्ष’ भावना के प्रति चिंता के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं और यह संकेत देते हैं कि हिंदू पहचान अपने आप में एक समानता पर आधारित समाज के विपरीत है।

वे भारत की अपनी कल्पना को ऐसा देश बताते हैं, जहाँ सभी समुदायों के लोगों को जगह मिलती है और किसी के साथ धर्म या विचारधारा के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता। लेकिन ऐसा कहते हुए ही कृष्णा की दोहरी सोच और पाखंड सामने आता जाता है।

साल 2018 में टीएम कृष्णा ने खुले तौर पर यह स्वीकार किया था कि केरल जैसे राज्यों में जब कम्युनिस्टों या इस्लामी संगठनों द्वारा RSS के सदस्यों की हत्या होती है, तो उन्हें कोई सहानुभूति महसूस नहीं होती। इतनी ही नहीं, उन्होंने इसके लिए सीधे तौर पर BJP को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उसी ने उन्हें इतना ‘असभ्य’ और ‘अमानवीय’ बना दिया है।

जो कृष्णा हर विचारधारा को जगह देने की बात करते हैं, वही खुद उन विचारधाराओं के प्रति असहिष्णुता दिखा चुके हैं जो उन्हें पसंद नहीं हैं, जिनमें हिंदू विचारधारा भी शामिल है।

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