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जिन फिल्मों को दिखाने से खराब हो भारत का नाम, केरल सरकार ने IFFK में उन्हें ही चलवाया: जानिए कौन सी हैं ये फिल्म, कैसे वामपंथी एजेंडे के लिए बैठीं फिट

                                                    पिनाराई विजयन (IFFK) (साभार -AI)
केरल में आयोजित 30वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ केरल (IFFK) को लेकर राजनीतिक और वैचारिक विवाद पिछले दिनों काफी चर्चा में था। मामला तब सामने आया जब पता चला कि केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और सामाजिक सौहार्द से जुड़े मामलों के कारण कुछ फिल्मों को सेंसर छूट देने से इनकार कर दिया और केरल की वामपंथी सरकार ने फिर भी उन फिल्मों को दिखाने का ऐलान किया।

दरअसल, IFFK 2025 में दिखाने के लिए केंद्र सरकार ने 178 फिल्मों को सेंसर छूट दी थी। वहीं 19 के करीबन फिल्म ऐसी थीं जिन्हें दिखाने से रोका गया था। इनमें से भी 6 ऐसी थी जिन्हें लेकर कहा गया कि ये देश के हित में नहीं हैं। केंद्र के इस निर्णय को सुनकर केरल सरकार ने इसे फासीवाद, तानाशाही और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला करार देना शुरू कर दिया। बाद में खबर आई कि केंद्र द्वारा रोकी गई फिल्मों से कुछ को पिनरई विजयन सरकार की अनुमति से फिल्म फेस्टिवल में चला दिया गया है।

केंद्र सरकार ने किन फिल्मों पर आपत्ति जताई

बता दें कि जिन छह फिल्मों को सेंसर छूट नहीं दी गई, उनमें यस (इजराइल, 2025), ऑल दैट’स लेफ्ट ऑफ यू (फ़िलिस्तीन, 2025), क्लैश (इजिप्ट, 2016), ए पोएट (कोलंबिया, 2025), ईगल्स ऑफ द रिपब्लिक (इजिप्ट, 2025) और फ़्लेम्स (इंडिया, 2025) शामिल हैं।

ऑल दैट’स लेफ्ट ऑफ यू एक पैलेस्टाइनियन ड्रामा फिल्म है, जो तीन पीढ़ियों के परिवार की कहानी दिखाती है। 1948 के नकबा से 2022 तक फैली यह फिल्म इजरायली कब्जे के कारण विस्थापन, आघात और संघर्ष को दिखती है। भारत में इसे थिएटर रिलीज के लिए बैन नहीं किया गया, लेकिन दिसंबर 2025 के केरला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (IFFK) में स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं मिली। केंद्र सरकार ने सेंसर छूट देने से इनकार कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार कूटनीतिक संवेदनशीलता और भारत-इजरायल मजबूत संबंधों के कारण पैलेस्टाइन समर्थक कंटेंट को रोका गया।

यस 2025 की एक इजरायली ड्रामा फिल्म है। इसे निर्देशक नदव लापिद ने बनाया है। फिल्म की कहानी 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद की है। इसमें एक जाज संगीतकार और उसकी डांसर पत्नी की कहानी को दिखाया गया है, जो अमीर लोगों का मनोरंजन करते हैं।

उसी समय पूरा देश युद्ध और दुख की मार झेल रहा होता है। फिल्म इजरायली समाज की आलोचना करती दिखाती है कि कैसे लोग नैतिक रूप से गिरते जा रहे हैं और युद्ध की वजह से समाज में क्या बदलाव आ रहे हैं। जिसके कारण कूटनीतिक संवेदनशीलता, विदेशी संबंध और भारत-इजरायल की मजबूत दोस्ती के चलते पैलेस्टाइन-इजरायल संघर्ष से जुड़े कंटेंट को रोका गया।

क्लैश 2016 की एक इजिप्टियन ड्रामा फिल्म है। इसे निर्देशक मोहम्मद दीब ने बनाया है। फिल्म पूरी तरह एक पुलिस वैन के अंदर सेट है। यह 2013 में मोहम्मद मुर्सी को हटाए जाने के बाद काहिरा में हुए दंगों की कहानी दिखाती है। वैन में मुस्लिम ब्रदरहुड समर्थक, सेना समर्थक, पत्रकार और आम लोग फंस जाते हैं। यह समाज के विभाजन, पुलिस क्रूरता और मानवीयता को दर्शाती है। भारत में इसे दिसंबर 2025 के केरला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (IFFK) में स्क्रीनिंग से रोका गया था। केंद्र सरकार ने इसे  कूटनीतिक संवेदनशीलता के चलते मध्य पूर्व संघर्ष से जुड़े कंटेंट को रोका था।

ए पोएट एक कोलंबियन ड्रामा-कॉमेडी फिल्म है। फिल्म की कहानी एक बूढ़े, असफल कवि की है, जो शराब पीकर सड़कों पर घूमता है और अपनी जिंदगी से हताश है। वह एक गरीब लड़की को कविता सिखाता है, लेकिन अच्छे इरादों से शुरू हुई यह दोस्ती गलत फैसलों में बदल जाती है। फिल्म कलाकारों की जिंदगी की मुश्किलों पर हल्की-फुल्की आलोचना करती है। केंद्र सरकार ने इसे कूटनीतिक संवेदनशीलता के चलते  इस विवादास्पद थीम वाली फिल्मों को रोका गया दिखने से।

फ़्लेम्स एक भारतीय फिल्म है, जिसमें मूक प्रवासी खेत मजदूर और उसके नाबालिग बेटे की कहानी है, जिसमें बेटे पर हत्या का आरोप लगता है और पिता न्याय की लड़ाई लड़ता है। फिल्म जातिवाद, सामाजिक अन्याय, पुलिस हिंसा और प्रवासी मजदूरों के मुद्दों को छूती है।

केंद्र सरकार (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय) ने इसे इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ केरला (IFFK) में स्क्रीनिंग के लिए मना किया था। क्यूकी इस फिल्म में जातिवाद जैसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर फोकस किया गया है।

 केंद्र सरकार का कहना था कि इन फिल्मों में संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मुद्दों को एकतरफा, भड़काऊ और वैचारिक प्रोपेगेंडा के रूप में पेश किया गया है। खासकर इजरायल-फ़िलीस्तीन संघर्ष से जुड़ी फिल्मों को लेकर विदेश मंत्रालय ने गंभीर आपत्ति जताई थी।

जानकारी के मुताबिक, यस और ऑल दैट स लेफ्ट ऑफ यू जैसी फिल्में या तो इजरायलियों के नरसंहार का मजाक उड़ाती हैं या फिर नकबा जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर दिखती हैं।

मौजूदा वैश्विक हालात में, जब पश्चिम एशिया पहले से ही तनावपूर्ण स्थिति में है, ऐसी फिल्मों का दिखाना भारत को अंतरराष्ट्रीय विवादों में घसीट सकता है। इसी तरह फ्लेम नामक भारतीय फिल्म पर जाति व्यवस्था को लेकर एकतरफा और भड़काऊ नैरेटिव फैलाने का आरोप है।

ईगल्स ऑफ द रिपब्लिक को लेकर भी विदेश मंत्रालय ने आपत्ति जताई थी, क्योंकि इसका असर भारत और मिस्र के रिश्तों पर पड़ सकता है। ऐसे समय में जब पाकिस्तान पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर सक्रिय है, तब भारत किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहता है जो उसके रणनीतिक फायदे को नुकसान पहुँचा सकता है। केंद्र सरकार का साफ कहना था कि इन फिल्मों को दिखाना देशहित के खिलाफ हो सकता है।

सेंसर छूट का नियम और IFFK आयोजकों की लापरवाही

मालूम हो कि भारत में किसी भी फिल्म फेस्टिवल में बिना CBFC सर्टिफिकेट या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से विशेष सेंसर छूट के फिल्मों को दिखाना नियमों के खिलाफ है। यह कोई नई व्यवस्था नहीं है और दशकों से यही प्रक्रिया चली आ रही है।

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक IFFK आयोजकों ने न केवल समय पर आवेदन नहीं किया, बल्कि अधूरी जानकारी भी दी। नियमों के अनुसार सेंसर छूट के लिए कम से कम 15 दिन पहले आवेदन करना जरूरी होता है, लेकिन आयोजकों ने केवल 9 दिन पहले आवेदन किया।

इसके अलावा कई फिल्मों के सिनॉप्सिस, ट्रेलर और अन्य जरूरी दस्तावेज समय पर जमा नहीं किए गए, जिसकी वजह से प्रक्रिया में देरी हुई। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने तेजी दिखाते हुए 178 फिल्मों को छूट दे दी। इससे साफ होता है कि केंद्र का उद्देश्य फिल्म फेस्टिवल को रोकना नहीं, बल्कि केवल उन फिल्मों पर आपत्ति जताना था जिनसे राष्ट्रीय हितों को खतरा हो सकता था।

केरल सरकार की जिद्द

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार पर संघ परिवार की तानाशाही का आरोप लगाया और कहा कि केरल ऐसी सेंसरशिप के सामने नहीं झुकेगा। संस्कृति मंत्री साजी चेरियन और IFFK चेयरमैन रेसुल पुकुट्टी ने भी इसी लाइन को आगे बढ़ाया।

पुकुट्टी ने इसे संविधान के तहत अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल बताया, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में राज्य सरकार को मनमानी करने का अधिकार मिल जाता है।

संविधान के तहत विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध और राष्ट्रीय सुरक्षा पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसके बावजूद केरल सरकार ने साफ कहा कि सेंसर छूट मिले या न मिले, फिल्में दिखाई जाएँगी। यह रवैया बताता है कि मामला कला से ज़्यादा वैचारिक मतभेद और केंद्र से टकराव की राजनीति का है।

लेफ्ट-लिबरल समर्थन और सवालों से बचने की रणनीति

इस पूरे विवाद में लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम पूरी तरह से केरल सरकार के समर्थन में खड़ा नजर आया। कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने IFFK में फिल्मों की स्क्रीनिंग को लेकर उठे विवाद पर कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव केरल में दिखाई जाने वाली 19 फिल्मों को केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी न देने के कारण एक अनावश्यक और शर्मनाक विवाद खड़ा हो गया है।

थरूर के मुताबिक, शुरुआत में प्रतिबंधित फिल्मों की संख्या इससे कहीं अधिक थी, लेकिन महोत्सव के अध्यक्ष रेजुल पी के अनुरोध पर उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव से हस्तक्षेप कर कई फिल्मों को मंजूरी दिलवाई। हालाँकि, बाकी बची फिल्मों को लेकर अब भी विदेश मंत्रालय की स्वीकृति का इंतजार है।

उन्होंने आरोप लगाया कि जिन 19 फिल्मों को मंजूरी नहीं दी गई है, उनकी सूची नौकरशाही की सिनेमाई निरक्षरता को दर्शाती है। थरूर ने कहा कि 1928 की क्लासिक फिल्म बैटलशिप पोटेमकिन, जिसे दुनिया भर में करोड़ों लोग देख चुके हैं, उसको अनुमति न देना हास्यास्पद है। वहीं, कुछ फिलिस्तीनी फिल्मों पर रोक को उन्होंने सांस्कृतिक समझ की कमी नहीं, बल्कि जरूरत से ज्यादा सतर्क नौकरशाही सोच का नतीजा बताया।

हैरानी की बात यह है कि जिन छह फिल्मों को सेंसर छूट नहीं मिली थी, उनमें से ईगल्स ऑफ द रिपब्लिक, ए पोएट और फ़्लेम्स को केरल सरकार पहले ही दिखा चुकी है। यानी चेतावनी और संभावित कानूनी कार्रवाई की बात सामने आने के बावजूद राज्य सरकार जानबूझकर टकराव को आगे बढ़ा रही है।

फिल्म फेस्टिवल की आड़ में चलाया जा रहा एजेंडा

IFFK की शुरुआत एक सांस्कृतिक आयोजन के रूप में हुई थी, लेकिन अब यह धीरे-धीरे वैचारिक राजनीति का मंच बनता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन यह आजादी निरंकुश नहीं होती। जब बात देश की सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द और विदेश नीति की हो, तब जिम्मेदारी सबकी होती है और उतनी ही जरूरी होती है।

IFFK विवाद में केरल सरकार के रवैया से यह दिखाता है कि यहाँ उद्देश्य कला का संरक्षण नहीं, बल्कि केंद्र सरकार से टकराव और वैचारिक संदेश देना है। आज IFFK एक फिल्म फेस्टिवल से ज्यादा लेफ्ट-लिबरल प्रोपेगेंडा का मंच बनता दिखाई दे रहा है।

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