पाकिस्तान वाले साबरी ने नहीं, बॉलीवुड वाले साहिर लुधियानवी की लिखी है ‘न तो कारवाँ की तलाश है’, ‘धुरंधर’ से पहले ‘बरसात की रात’ में भी थी यह कव्वाली
फिल्म धुरंधर और फिल्म 'बरसात की एक रात' ( फोटो साभार-जागरण)
बॉलीवुड की ब्लॉक बस्टर फिल्म धुरंधर में जिस कव्वाली ‘न तो कारवाँ की तलाश है, न तो हमसफर की तलाश है’ का इस्तेमाल हुआ है, वह 1960 की हिंदी फ़िल्म ‘बरसात की रात’ में फिल्माई गई कव्वाली से मिलती है।
ऐपल म्यूजिक स्टोर के स्क्रीन शॉट से भी इसकी जानकारी मिलती है। फिल्मी दस्तावेजों और आधिकारिक क्रेडिट के अनुसार, ये गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे थे और इसका संगीत रौशन ने दिया था। इस कव्वाली में कई गायक-गायिकाओं की आवाज हैं। इसे एक समूह-प्रस्तुति के रूप में रिकॉर्ड की गई थी। मन्ना डे, मोहम्मद रफी, आशा भोंसले, सुधा मल्होत्रा और एसडी बातिश शामिल थे। रिकॉर्ड्स के मुताबिक, यही इसका पहला प्रकाशित और व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त फिल्मी वर्जन है।
इसी आधार पर कहा जाता है कि इस कव्वाली का आधिकारिक फिल्मी origin भारतीय सिनेमा और बॉलीवुड से जुड़ा है। संगीत कंपनियों, फ़िल्म आर्काइव्स में लेखक, संगीतकार और गायकों के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। इसलिए जब ‘क्रेडिट किसे जाता है’ जैसे सवाल उठते हैं, तो ये 1960 की फिल्म ‘बरसात की रात’ को याद कर रहे हैं।
हालाँकि कव्वाली एक शास्त्रीय या निजी विधा नहीं है। यह सूफी परंपरा से निकली एक साझा और मौखिक संगीत परंपरा है। इसकी जड़ें पंजाब क्षेत्र में फैली हुई हैं। यही वजह है कि कुछ संगीत प्रेमी और इतिहासकार यह तर्क देते हैं कि ‘बरसात की रात’ की कव्वाली की धुन और भाव लाहौर-केंद्रित सूफी कव्वाली परंपरा से प्रेरित लगते हैं। अक्सर इस संदर्भ में मुबारक अली खान और फतह अली खान द्वारा 1950 के दशक में गाई गई कव्वाली ‘न तो बुतकदे की तलब मुझे’ का जिक्र किया जाता है। इस गाने को आमिर सावरी ने लिखा था।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण फर्क समझना ज़रूरी है। प्रेरणा या सांस्कृतिक समानता का दावा ऐतिहासिक चर्चा का विषय हो सकता है। हालाँकि अब तक ऐसा कोई ठोस, प्रकाशित ऑडियो या दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जो यह सिद्ध करे कि ‘न तो कारवाँ की तलाश है’ के पूरे बोल उसी रूप में 1960 से पहले रिकॉर्ड होकर जारी किए गए थे। इसलिए समानता को प्रमाण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में देखा जाता है। मौखिक परंपराओं में ऐसे प्रभाव आम होते हैं, लेकिन क्रेडिट तय करने के लिए दस्तावेजी साक्ष्य जरूरी हैं।
‘बरसात की रात’ का ये गाना सिर्फ कव्वाली भी नहीं है। लगभग 13 मिनट लंबा यह गीत सूफी और निर्गुण परंपरा से शुरू होकर भक्ति आंदोलन की ओर बढ़ता है। इसमें राधा-कृष्ण और मीरा की झलक मिलती है, फिर बुद्ध के बोधि वृक्ष तक पहुँचता है और आगे मसीह की करुणा का प्रतीक बनता है। और यही वजह है कि इसे गंगा-जमुनी तहजीब और भारत की बहुधार्मिक सांस्कृतिक चेतना का एक सिनेमाई दस्तावेज भी माना जाता है।
यद्यपि यह कव्वाली पाकिस्तान और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत प्रेमियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है, लेकिन इसका निर्माण और मूल भारत से ही है।
सार यही है कि यह कव्वाली सांस्कृतिक रूप से साझा विरासत का हिस्सा हो सकती है, क्योंकि सूफी संगीत की जड़ें आधुनिक भारत-पाकिस्तान की सीमाओं से पहले की हैं। लेकिन जब सवाल गीत की पैदाइश, लेखक और क्रेडिट का आता है, तो उपलब्ध ऐतिहासिक और फिल्मी रिकॉर्ड यह स्पष्ट करते हैं कि इसका प्रामाणिक, प्रकाशित और मान्यता प्राप्त 1960 में भारत में बनी फ़िल्म ‘बरसात की एक रात’ से ही सामने आता है। यही वजह है कि मौजूदा बहस में सांस्कृतिक साझेदारी को स्वीकार करते हुए भी आधिकारिक क्रेडिट भारतीय सिनेमा को दिया जाता है।
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