‘स्वरा भास्कर’ मत बनो AR रहमान, विवादों में खुद घुसो फिर बोलो- नहीं मिल रहा काम: तुम्हारे घर में तिलक लगाकर एंट्री बैन और ‘कम्युनल’ फिल्म इंडस्ट्री है?
एआर रहमान, काम न मिलने का ठीकरा पावर शिफ्ट पर फोड़ा (फाइल साभार: Instagram)
मुसलमानों में सबसे बड़ी बीमारी यह है कि पहले खुद victim card खेलते हैं और पलटवार होने पर गरीब, मज़लूम और शरीफ बन दूसरे को कसूरवार बता बेशर्मी से victim card खेलने लगते हैं। ऐ आर रहमान तुम्हारी अम्मी ने क्यों किसी हिन्दू को घर में तिलक लगाकर आने से मना किया था? और तुमने खुद कितने विवादित बयान दिए और अब जवाब मिलने पर सिस्टम को कम्युनल बता रहे हो? रहमान मियां समय बदल रहा है हर सनातन विरोधी की रही हालत हो रही है।
आज का जमाना बड़ा बेरहम है। यहाँ गाना अच्छा लगा तो रील बन गई, नहीं लगा तो दो सेकेंड में स्किप। और जब स्किप बटन ज्यादा दबने लगे, तब कुछ लोग सुर सुधारने की जगह बयान सुधारने लगते हैं। एक समय पर इंडस्ट्री के जाने-माने संगीतकार रहे एआर रहमान भी ऐसा ही करते दिखे। काम नहीं मिला तो बात सीधा देश की ‘पावर शिफ्ट‘ तक पहुँचा दी और उसमें ‘कम्युनल एंगल’ भी घुसेड़ दिया।
मतलब गाना नहीं चला तो वजह सुर नहीं, सिस्टम है। ये देश के आम लेफ्ट-लिबरल गैंग का वही पुराना रोना है- पहले खुद को विक्टिम दिखाओ, फिर माहौल को दोषी ठहराओ और आखिर में बात को कम्युनल रंग दे दो ताकि चर्चा पक्की हो जाए।
अब जरा आराम से सोचिए। एआर रहमान का करियर जिस दौर में फला-फूला, क्या उस समय देश में पावर शिफ्ट नहीं हुए थे? क्या तब सरकारें नहीं बदली थीं। क्या तब सिस्टम जस का तस था? बिल्कुल नहीं। उस दौर में भी सरकारें बदलीं, सोच बदली, देश बदला। लेकिन रहमान का नाम आते ही कैसेट बिक जाती थीं। हर गली-मोहल्ले में रहमान के गाने बजते थे। तब उन्हें खतरा नहीं दिखा, तब इंडस्ट्री उन्हें कम्युनल नहीं लगी। सवाल ये है कि अगर पावर शिफ्ट से ही इंडस्ट्री बदल जाती है, तो तब क्यों नहीं बदली? तब क्यों रहमान के गानों को ऑस्कर तक मिल रहे थे?
असल बात ये है कि समय बदल गया है और मार्केट भी। एक समय था जब एआर रहमान का नाम ही काफी होता था। फिल्म चाहे फ्लॉप हो, लेकिन रहमान के गाने सुपरहिट होते थे। आज लोग एक क्लिक में गाना स्किप कर देते हैं। इसमें न सरकार की गलती है, न इंडस्ट्री की। ये सब मार्केट का खेल है। जो पसंद आया, वो चल गया। जो नहीं पसंद आया, वो पीछे रह गया।
आज लोग गाना नहीं, पूरा कंटेंट देखते हैं। आज मार्केट में सिर्फ एआर रहमान नहीं है। आज सैंकड़ों सिंगर, म्यूजिक डायरेक्टर, इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट हैं, जो कम बजट में भी लोगों के दिल तक पहुँच रहे हैं। ये कंपीटीशन का दौर है। लेकिन इस कंपीटीशन में उतरने की जगह अगर कोई ये कहे कि मुझे काम इसीलिए नहीं मिल रहा क्योंकि ‘पावर बिना टैलेंट वाले लोगों के हाथों में आ गई है।’
यह एक वरिष्ठ संगीतकार के मुँह से सुना गया बेहुदा बयान से कम कुछ नहीं है, जो खुद को सर्वश्रेष्ठ दिखाने के चक्कर में सिर्फ दूसरों को नीचा दिखाना जानता है। ये काम न मिलने का बहाना नहीं तो और क्या है? और यहीं से ‘कम्युनलिज्म’ वाला कार्ड निकाला जाता है। जब खुद को नए दौर में फिट करने में दिक्कत हो रही हो, तो बात घुमा दी जाती है। जबकि बात होनी चाहिए कि आज की ऑडियंस क्या सुनना चाहती है, बात होनी चाहिए कि म्यूजिक में क्या-क्या बदलाव आए हैं। पर सीधा कह दिया जाता है कि इंडस्ट्री बदल गई है।
ये वही विक्टिम नैरेटिव है, जो हम पहले भी देख चुके हैं। वही स्वरा भास्कर वाला। काम न मिले तो सिस्टम दोषी, सरकार दोषी, माहौल दोषी होते हैं। लेकिन जो लोग सचमुच काम करना चाहते हैं, उन्होंने हर दौर में कामयाबी देखी है। चाहे पहले की सरकार रही हो या आज की। आज भी अरिजीत सिंह, श्रेया घोषाल, विशाल ददलानी, प्रीतम चक्रबोर्ती जैसे संगीतकार 10-15 सालों से लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं।
और मजेदार बात ये है कि आज के दौर में तो मौके पहले से कहीं ज्यादा हैं। स्पॉटिफाई, यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म खुले पड़े हैं, जिससे करियर बनाना पहले जितना कठिन नहीं रहा। आज कोई भी अपनी कला सीधे जनता तक पहुँचा सकता है। नए सिंगर बिना किसी गॉडफादर के हिट हो रहे हैं। ऐसे में अगर एआर रहमान जैसे दिग्गज खुद को इस दौर में फिट नहीं कर पा रहे, तो इसमें सरकार की गलती कैसे हो गई?
सच ये है कि इंडस्ट्री कम्युनल नहीं, कमर्शियल है। जो बिकता है, वही चलता है। अच्छे गीत आज भी सुने जाते हैं, लेकिन अच्छे का मतलब बदल गया है। अब लोग लंबा-चौड़ा म्यूजिक नहीं, सीधा दिल को लगने वाला कंटेंट चाहते हैं। ओटीटी का जमाना आ गया है। लोग कहानियों पर फोकस कर रहे हैं, किरदारों पर ध्यान दे रहे हैं। जो चीज समझ नहीं आती, उसे स्किप कर देते हैं। ये बदलाव है, साजिश नहीं।
यहाँ बात अगर एआर रहमान की हो रही है, तो यह पहली बार नहीं है जब वो किसी विवाद की वजह से सुर्खियों में आए हों। फर्क बस इतना है कि पहले चर्चा संगीत से होती थी, अब हर बार अपमानजनक बयान और सफेद झूठ से होती है। उनकों सुरों से ज्यादा विवादों से जुड़ाव बढ़ रहा है। और यही बात लोगों को खटक रही है। क्योंकि जब आप खुद को ‘मोरल हाई ग्राउंड’ पर रखकर बोलेंगे, तो लोग तो आपकी हर पुरानी बात खँगालेंगे ही न।
लोगों को अभी भी वो चेन्नई वाला कॉन्सर्ट याद है, जहाँ भगदड़ में महिलाओं के साथ यौन शोषण की कहानियाँ वायरल हुईं। याद है एआर रहमान की अम्मी का वो बयान, जिसमें तमिल हिंदू गीतकार पिरईसूदन को रहमान के घर में तिलक हटाकर आने को कहा गया था। और इतना ही नहीं, कभी न भूलने वाला एआर रहमान का वो बयान, जब अब्बा की मौत के लिए हिंदू देवताओं को जिम्मेदार ठहराया गया था।
यही सब कम नहीं था, तो हाल ही में एक और विवाद फिर सामने आया, जब रहमान ने एक ‘पीडोफाइल’ कोरियोग्राफर के साथ काम किया, जिस पर यौन उत्पीड़न का आरोप है। आज का दौर कुछ भूलने नहीं देता, सोशल मीडिया सब याद दिलाता रहता है। अब इसी बैकग्राउंड के साथ जब एआर रहमान ये कहते हैं कि ‘पावर शिफ्ट’ के बाद इंडस्ट्री ‘कम्युनल’ हो गई है, तो यहाँ आपत्ति जताना वाजिब है।
आखिर में बात इतनी सी है। इंडस्ट्री बदली है, लेकिन खराब नहीं हुई है। मौके आज भी हैं, बल्कि पहले से ज्यादा हैं। टैलेंट आज भी चलता है। लेकिन अगर कोई अपने पुराने फॉर्मूले में ही अटका रह जाए और नए दौर को समझने से मना कर दे, तो फिर दोष बाहर ढूँढना आसान हो जाता है। कम्युनल, पावर शिफ्ट, सिस्टम- ये सब शब्दों से आप चर्चा में आ सकते हो, लेकिन लोगों की पसंद नहीं बदल सकते। हकीकत बहुत सीधी है, अगर आज की ऑडियंस एआर रहमान के गानों से ज्यादा किसी नए सिंगर के गाने सुन रही है, तो इसमें सरकार की गलती नहीं है। यह समय की चाल है। इसीलिए कमबैक करने के लिए खुद को समय के साथ ढालने की जरूरत है। बिल्कुल वैसे, जैसे रैपर हनी सिंह लगे पड़े है।
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