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सूने दिलों में धड़कन जगाने आया भोलेनाथ का सावन का महीना और वीणा के तारों को चार चाँद लगाते फिल्मों के गीत 'सावन का महीना पवन करे सोर(शोर) से लेकर ‘मोहब्बत बरसा देना’


सावन का महीना जिसे भोलेनाथ शिव के नाम से अधिक जाना जाता है लेकिन भोलेनाथ सिर्फ स्वयं आनन्दित होते समस्त सृष्टि को भी आनन्दित कर देते हैं। 
सावन महीना इतना ऊर्जावान होता है कि बच्चों से लेकर वृद्ध तक में नवचेतना दौड़ने लगती है। प्रकृति भी इससे अछूती नहीं रहती। वर्षा ऋतु से चारों ओर हरियाली होने से उपवनों में खिलते पुष्प भी प्रकृति को नवजीवन प्रदान करती है। आकाश पर इंद्रधनुष मन को लुभाते हैं। ऐसे में गीतकार क्यों चूंके।

फिल्मों में एक से बढ़कर एक गीतों की हुई रचना से समस्त सृष्टि ख़ुशी में झूम जाती है। कई गाने तो इतने चर्चित होते हैं कि पूरी की पूरी फिल्म की बॉक्स ऑफिस पर धूम मचवा देते हैं। 

 

विक्रम संवत 2082, मास – श्रावण। श्रावण, जिसे लोकभाषा में सावन कहते हैं, अपने साथ कितना कुछ लेकर आता है  सावन सिर्फ़ झमाझम बारिश, चारों तरफ पसरी हरियाली और खा-खाकर अघाए शाकाहारी पशुओं का ही महीना नहीं है – बल्कि ये रचनात्मकता का शिखर छूने वालों के लिए भी एक आदर्श महीना है। इतिहास तो यही कहता है। बॉलीवुड के गीतकारों ने इसी महीने के ऊपर एक से बढ़कर एक गीत लिखे हैं, जिन पर फिल्मों में एक से बढ़कर एक दृश्य फिल्माए गए हैं। 

हम कविताओं में देखते हैं कि कैसे सावन की लयबद्ध हवाओं में कवियों ने संगीत सुना। लेकिन, जब आनंद बख़्शी सावन पर गाना लिखने बैठते हैं तो यही हवा उन्हें शोर करती हुई सुनाई देती है। सावन में शोर (सोर?) भी संगीत है। ये एक गीत आनंद बख़्शी को शीर्ष पर पहुँचा देता है। शोर करते पवन और गजब ढाती पुरवइया के बीच जियरा झूमने लगे, तभी ‘मिलन’ (1967) होता है। ये सावन में ही हो सकता है। ये कोई आनंद बख़्शी ही लिख सकते थे।

ख़ैर, सावन की एक और विशेषता देखिए। ये सबसे बड़ी है। जब टोनी कक्कर भी इस पर गाना लिखता है तो अरिजीत सिंह ऐसा गा देते हैं कि लोग गीतकार को भूल जाते हैं। आज की पीढ़ी के लिए – मोहब्बत बरसा देना तुम, कि सावन आया है… हालाँकि, जिस गाने ने मीका को लोकप्रिय बनाया वो भी कुछ यूँ ही था – “सावन में लग गई आग, कि दिल मेरा हाय”।

एक बार मैंने माँ से पूछा, “आपका फेवरिट गाना कौन सा है?” अब एक क्लिक पर गाने उपलब्ध हैं, इसे प्रदर्शित करने का इससे बेहतर मौका क्या हो सकता था। माँ ने कुछ देर सोचकर कहा, “मेरे नैना सावन-भादो, फिर भी मेरा मन प्यासा”। हमने डाउनलोड किया, बजा दिया। परम संतुष्टि! सीमेंट की जगह मिट्टी के ‘गिलेवा’ से जुड़ी ईंटों की दीवारों पर खड़ा घर, जिसके ऊपर की छत मिट्टी से ही गढ़े गए खपरों की थीं, उसके नीचे रह रहे बच्चों ने इंटरनेट सीखकर गाना बजाना भी जान लिया था!

बड़े हुए तो समझ आया कि कैसे आनंद बख़्शी ‘बिजुरी’ में ‘बीते समय की रेखा’ देख रहे थे। सावन में कड़कती बिजली डराती नहीं, अतीत की यादों का दस्तावेज खोलती है- ये भी पता लगा! ये गीत था ‘महबूबा‘ (1976) का! कॉलेज के समय एक गाना सुना, जिसके बोल बार-बार कानों में गूँजते थे:

                                                  जब दर्द नहीं था सीने में

                                               क्या ख़ाक मज़ा था जीने में
पिछली वाली घटना से एक दशक बाद की बात है। दिल्ली आ गया था, पत्रकारिता करने लगा था। एक बार हमलोग गाँव जा रहे थे, साथ में छोटा भाई था। हमलोग ऑटो में थे। मैंने देखा कि वो इयरफोन लगाकर गाने सुन रहा है। मैंने फोन लेकर गाना चेंज करने की कोशिश की। उसने झल्लाकर कहा कि पुराना गाना नहीं नहीं सुनना है। फिर भी मैंने किशोर कुमार की आवाज़ वाला वो गाना लगाया – “अब के शायद हम भी रोयें सावन के महीने में, जब दर्द नहीं था सीने में…”। उसने वो गाना पूरा सुना। आनंद हो सकता है कभी-कभार आज भी सुन लेता हो। 1977 में ‘अनुरोध‘ का ये गीत भी आनंद बख़्शी की क़लम से ही निकला था। खैर… फ़ास्ट फॉरवर्ड टू 21वीं सदी नाउ!
                                             आई है रात मतवाली बिछाने हरियाली
                                             ये अपने संग में लाई है सावन को…
जब सावन को लेकर गीत लिखे जाते हैं, तब युद्ध के भयानक अस्त्र-शस्त्र भी कोमल और प्यारे स्वरूपों में परिवर्तित हो जाते हैं। तभी तो जब जावेद अख़्तर ‘लगान’ (2001) का गाना ‘घनन-घनन’ लिखते हैं तो ‘बिजुरी की तलवार’ और ‘बूँदों के बाण’ का ज़िक्र आता है, लेकिन ये युद्ध प्रेमोद्दीपक है, ये खुशियाँ बरसाने वाला है।
हालाँकि, सावन के महीने को इस सदी के किसी गाने से वर्णित करना बड़ा मुश्किल होगा, क्योंकि बड़े-बड़े दिग्गजों का करियर इस महीने ने बनाया है। यकीन न हो तो मुंबई की असली बारिश में फ़िल्माए गए गाने ‘रिमझिम गिरे सावन‘ को उठा लीजिए। ‘मंज़िल’ (1979) ने कारोबार तो औसत ही किया था, लेकिन इस एक गाने ने ‘एंग्री यंग मैन’ के रोमांटिक साइड को युवाओं में स्थापित कर दिया, खाँटी अभिनय के लिए जानी जाने वाली मौसमी चटर्जी को ‘नेशनल क्रश’ बना दिया। 
जब जावेद अख़्तर सावन पर गीत लिखते हैं तो तलवार और बाण रोमांस की विषयवस्तु बन जाते हैं, वहीं जब योगेश लिखते हैं तो बारिश और ठंडी हवाओं में भी आग जल उठता है। वरना, मन कैसे सुलगेगा भला? पानी में अगन कैसे लगेगी भला? यही तो ख़ूबसूरती है सावन की, पानी और आग साथ मिल जाते हैं। जब सावन का ज़िक्र हो ही आया है तो बॉलीवुड के OG मल्टीटास्कर को कौन भूल सकता है भला – फिर से किशोर कुमार! केवल योगेश ही सावन में मन सुलगने और अगन लगने की बातें नहीं लिखते हैं, उनसे 2 दशक पूर्व मज़रूह सुल्तानपुरी ये कारनामा कर चुके थे। शायद पानी और आग के मिलन के गुरु वही थे।
‘अजनबी’ किशोर कुमार जब ‘सावन की सूनी रात में’ ‘धुँधलाती और बलखाती हुई’ मधुबाला को देखते हैं तो उन्हें भी ऐसा ही लगता है कि वो ‘दिल ही दिल में जली जाती है।’ मज़रूह सुल्तानपुरी की बात हो रही है तो ये भी बता दें कि ‘एक लड़की भीगी-भागी सी’ लिखने के 41 साल बाद भी जब वो क़लम उठाते हैं तो ‘दहक’ में भी सावन को ही देखते हैं। कभी उन्होंने सावन में जलन लिखा, कभी उन्होंने ज्वाला में सावन लिखा। मैंने कहा न, सावन ही एकमात्र ऐसा मास है जहाँ गीतकार भीगी धरती में भी अगन देखता है। शायद, ये आग भी शीतल है! कितने अजीब संयोग बनता है न ये सावन! पृथ्वी को भिगोने वाले इस सावन का अग्नि से क्या नाता है, ये समझ नहीं आता।
मज़रूह सुल्तानपुरी और योगेश के बीच हमें कहीं गुलज़ार मिल जाते हैं। यूँ तो गुलज़ार के नाम पर कई नक़ली गीत इंटरनेट के इस ज़माने में चलते रहते हैं, ‘बीबी और मकान’ (1966) का गीत ‘सावन में बरखा सताये’ असली वाला है। ‘अग्नि लगाये कहीं अग्नि बुझाये’… गुलज़ार को भी ‘पल-पल छिन-छिन बरसते’ सावन में अग्नि ही दिखाई देती है। बाग़ की बहुत बात हो गई, आग को बुझाने वाली हवा की ओर बढ़ते हैं। आनंद बख़्शी से शुरू किया था, उनके साथ ही ख़त्म करते हैं।
मेरा मन प्यासा’ वाले आनंद बख़्शी एक दशक पहले ‘मौजवा’ और ‘नदी की धारा’ से संवाद किया करते थे। आनंद बख़्शी का कोई जवाब नहीं है! 1967 के ‘मिलन’ और 1976 की ‘महबूबा’ के बाद 1989 में ‘चाँदनी’ के लिए जब वो क़लम उठाते हैं तो विनोद खन्ना की उदासी को चित्रित करने के लिए सावन की शरण में ही पहुँचते हैं। कमाल की बात तो ये कि फिर से आग लग जाती है, उफ्फ! मैं बार-बार सावन में बरसते पानी को समझने के लिए इन गीतकारों के पास पहुँचता हूँ, ये हैं कि झमाझम बारिश में भी आग तापते जा रहे हैं।
वैसे कई गाने हैं जो  लाखों लोगों के पसंदीदा हैं और उनका ज़िक्र न होना उनकी लोकप्रियता को ज़रा सा भी कम नहीं करता। आनंद बख़्शी का ही लिखा – ‘आया सावन झूम के‘, ‘तेरी दो टकिये की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाये‘ और लता मंगेशकर की आवाज़ में आया ‘सावन में झूले पड़ें‘ – ये सब एक से बढ़कर एक गाने हैं। शायद अगले सावन में फिर लिखूँगा तो इन्हीं गानों का प्रमुखता से ज़िक्र हो!

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)

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