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मुसलमान क्यों नहीं देता भाजपा को वोट?

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिले प्रचण्ड बहुमत मिलने पर मुस्लिम समाज छाती पीटकर कहता था, अगर मुस्लिम ने भाजपा को वोट नहीं दिया होता, पार्टी को इतनी सीटें नहीं मिलती।
सीताराम बाजार मंडल में भाजपा की दयनीय स्थिति ; इस मंडल में जितने
अल्पसंख्यक  प्रकोष्ठों में एक भीड़ है, सब हाथी के खाने के दाँत और
दिखाने के और सत्यापित कर रहे हैं। 
कुछ दिनों पहले केंद्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने बयान दिया था कि मुस्लिम समुदाय के लोग बीजेपी को वोट नहीं देते इसके बावजूद भी पार्टी मुस्लिमों का ख्याल रखती है और उन्हें उचित मान सम्मान देती है. रवि शंकर प्रसाद के इस बयान एवं उत्तर प्रदेश में किसी मुस्लिम को भाजपा को टिकट न देने पर बहुत बवाल मचा था, मीडिया ने बात का बतंगड़ बनाकर खूब TRP बढ़ाई। मैंने भी इसी ब्लॉग पर शीर्षक "चिन्तन: भाजपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और संघ के मुस्लिम मंच का क्या है औचित्य?" के अंतगर्त जो प्रश्न उठाये थे, वह प्रश्न हर चुनाव में सत्यापित हो रहे हैं। लेकिन अब MCD चुनावों में भी साबित हो गया कि मुस्लिम वाकई में बीजेपी को वोट नहीं देते, क्योंकि इस चुनाव में बीजेपी ने 6 मुस्लिमों को टिकट दिया था जिसमें से एक का नामांकन रद्द हो गया, जबकि पांच उम्मीदवारों की जमानत ही जब्त हो गयी।
इस चुनाव में कुछ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की वही स्थिति है जिसका उल्लेख अपने उपरोक्त लेख में भी किया था।
हाँ, भाजपा और संघ अपने इन प्रकोष्ठों को ट्रिपल तलाक, राम मन्दिर मुद्दे और संघ के पद-संचालन का इन मुस्लिमों द्वारा स्वागत कर जनता को भ्रमित करने में प्रयोग करने के उद्देश्य से पाल रहे हैं, तब तो ठीक है, अन्यथा आआप और कांग्रेस की भांति भाजपा भी जनता को गुमराह करने में पीछे नहीं। संक्षेप में इतना ही कहना है, जनता को नहीं मालूम राजनीति क्या खिल रही है?
इसी चुनाव में एक भाजपा प्रत्याशी कुछ मुस्लिमों से मिली, किसी ने उस मतदान केन्द्र को जनसंघ के समय से संभाल रहे कार्यकर्ता को बताई, प्रथम तो दुःख हुआ कि "मेरे क्षेत्र में चुपचाप जाकर मिलना क्या उचित है? दूसरे, यदि उम्मीदवार मेरे इस मतदान पर 250 मुस्लिम वोट पक्के कर लिए हैं, इसका मतलब यह लहर दूर तक जाएगी और भाजपा से अब इस सीट को कोई नहीं छीन सकता।" लेकिन खोदा पहाड़ निकली मरी हुई चुइया भी नहीं। यानि अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के भी वोट नहीं। इस प्रकोष्ठ के पदाधिकारी को मतदान की शाम को 4 बजे स्कूटर पर कहीं जाते हुए शक्ल दिखी। इसकी समीक्षा करने के लिए भाजपा स्वयं देखे कि मुस्लिम बहुल मतदान केन्द्रों पर इन प्रकोष्ठो के कितने पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता हैं और पार्टी को उन केन्द्रों पर कितने वोट मिले हैं। उपरोक्त मंडल में जितने इन प्रकोष्ठों में सदस्य है उसे देखते हुए शून्य ही वोट मिले। क्या लाभ इन प्रकोष्ठों का? पता नहीं किस भ्रान्ति में भाजपा बैठी है। अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ भाजपा में सुरमा भोपाली बन रहे पदाधिकारियों तक के वोट नहीं मिले।
जबकि मतदान वाले दिन उसी अल्पसंख्यक पदाधिकारी ने एक अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ कार्यकर्ता( जिसे दूसरे पोलिंग एजेंट ने अंदर बैठने योग्य ही समझा, क्योंकि उसे केवल उर्दू ही आती थी, यानि बाहर ही रहा) को मण्डल पदाधिकारियों से इतना अधिक पैसा दिलवाने पर बूथ अध्यक्ष ने मण्डल प्रधान को सार्वजानिक रूप से विरोध किया। यानि अनपढ़ को शिक्षित से अधिक धन। प्रधान ने आज तक उस सेवानिर्वित कार्यकर्ता को उस दिन खर्च हुए पैसे तक नहीं दिए। जानकारी के अनुसार वह सेवानिर्वित चुनाव में हज़ार/पांच सौ खर्च कर देगा, लेकिन फालतू पैसा नहीं लेता। उसके पिताश्री का कहना था कि "चुनाव में दान दिया धन प्रयोग होता है।"
जहाँ तक मुस्लिम जनसंघ से लेकर आज भाजपा तक को वोट नहीं देता है, उसका कारण तत्कालीन जनसंघ नेता है, और यह कटु सत्य है, जिसे कोई नकार नहीं सकता। भाजपा को मुस्लिम वोट लेने है तो सर्वप्रथम "सबका साथ, सबका विकास" सार्थक सिद्ध करते हुए अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बंद करे और डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के बलिदान पर एक खुली बहस आयोजित करे। क्योंकि यही वह बलिदान था, जिसका कांग्रेस ने दुष्प्रचार किया कि "जनसंघ मुसलमान विरोधी है।" जिसे तत्कालीन जनसंघ नेताओं ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। डॉ मुखर्जी बलिदान हुए देशहित में न की मुस्लिम के विरोध में। जहाँ तक आरएसएस और हिन्दू महासभा का प्रश्न है, आज की तारीख में मुसलमान किस पार्टी में नहीं है? सब में है, जहाँ से खाने को मिले, खाओ लेकिन न वोट दो और न दिलवाओ, हिन्दू नेताओं को भ्रमित करते रहो और वोट के नाम पर लुटते रहो। यह आरोप नहीं, कटु सत्य है, जिसे मानते सभी है, लेकिन मुंह से सार्वजानिक कोई नहीं बोलता।
दिल्ली में जब 1967 में महानगर परिषद्(वर्तमानं विधान सभा) में जनसंघ सत्ता में आई, सबसे अधिक धन मीना बाजार पार्क, जामा मस्जिद, पर किया था। देखिए उसी पार्क की हालत। 1972 चुनाव में उसी जनसंघ की कितनी बुरी हार हुई। समझदार को इशारा ही बहुत है।
खैर, इस चुनाव में आप के 40 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई, कांग्रेस के 92 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई जबकि 5 बीजेपी उम्मीदवारों की भी जमानत जब्त हो गयी, मोदी लहर में पांच बीजेपी उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने पर लोग हैरान हो गए क्योंकि इस चुनाव में बीजेपी की बम्पर जीत हुई है, जब लोगों ने इन उम्मीदवारों के नाम देखे तो पता चला कि पाँचों मुस्लिम उम्मीदवार थे, बीजेपी ने सोचा था कि हो सकता है उन्हें मुस्लिमों के वोट मिल जाँय इसलिए मुस्लिम बहुत इलाकों में इन्हें टिकट दे दिया लेकिन सबकी जमानत ही जब्त हो गयी। जबकि काफी समय तक दिल्ली गेट उम्मीदवार का नाम लीडिंग में चल रहा था, यानि जब तक हिन्दू क्षेत्र रहे, भाजपा उम्मीदवार आगे रहा, और जैसे ही मुस्लिम क्षेत्र खुलने शुरू हुए, भाजपा उम्मीदवार जमानत जब्त की ओर बढ़ना शुरू हो गया।
इन भाजपा उम्मीदवारों के नाम हैं : कुरेशी नगर से रुबीना, जाकिर नगर से कुंवर रफ़ी, चौहान नगर से सरताज अहमद, मुस्तफाबाद से साबरा मलिक और दिल्ली गेट से फैमुद्दीन सिफ़ी.
दूसरे यह कि दिल्ली नगर निगम में भाजपा का बहुमत में आना, मोदी प्रभुत्व को बल देता है। क्योंकि इतने वर्षों से नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में भाजपा नाकाम रही, लेकिन कांग्रेस और आआप पार्टियाँ अपनी लड़ाई में इस मुद्दे को भुनाने में पूर्णरूप से असफल रहीं।  
यह कुछ लोगों के लिए चौंकाने वाला समाचार हो सकता है। लेकिन जमीन से जुड़े किसी भी कार्यकर्ता के लिए नहीं, क्योंकि उसको मालूम होता है की हकीकत क्या है। पाठकों को शायद यह जानकर हैरानी भी होगी, जब अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के पदाधिकारी अपने क्षेत्र में कहते हैं, "बीजेपी को तो वोट दोगे नहीं, लेकिन उस(?) पार्टी को वोट दो", जब पदाधिकारी ही ऐसा प्रचार करेगा, फिर कोई क्यों वोट करेगा? और इस बात को नीचे स्तर से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक जानता है, उसके बाबजूद उसको सिर पर बैठे रखा जाता है। अब इसको फिरकापरस्ती न कहा जाए तो क्या नाम दिया जाए? हालाँकि अपने निम्न लेख में बहुत ही स्पष्टा से लिखा था। इतना ही नहीं अपने पिछले लेख http://nigamrajendra28.blogspot.in/2017/04/blog-post_27.html



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NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
में भी प्रश्न किये हैं, कि इस तरह एक अनपढ़ को हज़ार रूपए दिलवाए जाते हैं। यह इस बात को भी सिद्ध करती है, कि चुनाव के लिए मण्डल के पास पर्याप्त धन था, लेकिन केवल अधिकारीयों ने अपनी वाह-वाह में ही खर्च किए।  यानि वास्तव पार्टी में यह लोग मात्र लूटने घसोटने के लिए हैं, वोट देने के लिए नहीं। भाजपा शीर्ष नेतृत्व को इस बात की भी जाँच करनी चाहिए कि जिन क्षेत्रों से भाजपा की जमानत जब्त हुई है, वहां अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के कितने कार्यकर्ता एवं पदाधिकारी हैं?  एक जहाँ भारत तो समस्त विश्व मोदीमय हो रहा है तो दूसरी तरफ मुस्लिम क्षेत्रों से पार्टी की जमानत जब्त हो, बहुत ही शर्म की बात है। इस विषय पर पार्टी को निष्पक्ष होकर मन्थन करना होगा। या जब किसी भी हिन्दू बहुल क्षेत्र से भाजपा द्वारा किसी मुस्लिम को टिकट देने पर उस उम्मीदवार को कोई भाजपाई एक भी वोट न दे, उस स्थिति में कोई इसे साम्प्रदायिकता का नाम न दे। ताली दोनों हाथों से बजती है, कभी एक हाथ से नहीं बजी।   
अवलोकन करें :--



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इन सभी मुस्लिम उम्मीदवारों ने तीन तलाक के खिलाफ बयान दिया था साथ ही अवैध बूचडखानों पर कार्यवाही के लिए योगी सरकार की तारीफ भी की थी।
लगता है, उत्तर प्रदेश में मुख्यमन्त्री योगी ने अवैध बूचड़खाने एवं गोश्त की दुकानें, बिजली चोरी आदि पर कहर भरपाया है, "कहीं ऐसा न हो अब भाजपा के सत्ता में आने पर योगी की तर्ज़ पर दिल्ली में भी ऐसा हो गया, हम रोज़ गोश्त कहाँ से खायेंगे।" दिल्ली के मुसलमानों में डर बैठा दिया है। जबकि चुनाव पूर्व इन्ही क्षेत्रों से भाजपा को ही वोट देने के समाचार सुनने को मिलते थे, जिन्हे सुन लगता था, इस बार निगम चुनावों में भाजपा को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिलेंगी। और चार सीटें बाजार सीताराम, मटिया महल, अजमेरी गेट और दिल्ली गेट सीटें भाजपा की झोली में स्पष्ट दिख रही थी, लेकिन अंदर क्या ज़हर भरा हुआ है, परिणाम आने पर पता चला। जो इस बात को सिद्ध करता है, कि दिल्ली में भी अवैध बूचड़खाने और गोश्त की दुकानों की कमताई नहीं। और यदि फिर भी भाजपा सत्ता में आ गयी, उस स्थिति में भाजपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ एवं संघ से मुस्लिम मंच के माध्यम से अवरोध करवाने का प्रयास करेंगे।
दिल्ली MCD चुनावों में केजरीवाल और कांग्रेस ने चुनाव आयोग की बढ़िया कमाई करा दी है क्योंकि केजरीवाल की प्रधानमंत्री बनने की लालच ने दिल्ली में इस कदर मोदी लहर पैदा की, जिसकी वजह से करीब 40 आप उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी, इसके अलावा राहुल गाँधी की मेहरबानी से 92 कांग्रेस उम्मीदवारों की भी जमानत जब्त हो गयी। 
अब प्रश्न यह है कि दिल्ली प्रदेश चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं --पद कुछ भी हो -- के विरुद्ध टिकट न मिलने या अन्य किसी कारण से पार्टी के विरुद्ध काम करने पर पार्टी से निकाल सकती है, लेकिन इतने वर्षों से भाजपा जो अपने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ को एक सफ़ेद हाथी की तरह पाल रही है, उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही कब होगी? या इस प्रकोष्ठ के विरुद्ध कार्यवाही करने का साहस नहीं? 

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