

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
पंजाब के राजपूत महासभा ने फिल्म पद्मावत का विरोध वापस ले लिया है। बुधवार (24 जनवरी) को राजपूत समाज से जुड़े लोगों ने पठानकोट में एक स्पेशल स्क्रीनिंग में फिल्म पद्मावत देखी। जिला प्रशासन ने इस स्क्रीनिंग का शाम 6 बजे से 9 बजे के बीच आयोजन किया था। राजपूत महासभा अबतक इस फिल्म का विरोध कर रही थी। फिल्म देखने के बाद राजपूत महासभा के अध्यक्ष दविन्दर दर्शी ने कहा कि हम पहले इसका विरोध कर रहे थे, जिसकी वजह से सिनेमा बनाने वालों को इसमें 300 कट लगाने पड़े।
उन्होंने कहा, ‘आज हमने फिल्म देखी, इसमें राजपूत समाज के खिलाफ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है, अब हम संतुष्ट हैं और फिल्म के रिलीज होने से हमें कोई परेशानी नहीं है।’ दविन्दर दर्शी ने कहा कि राजपूत समुदाय के 30 नेताओं ने प्रशासन के अनुरोध पर फिल्म देखी है और इसमें अब कोई विवाद नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि पंजाब के ज्यादातर सिख और हिन्दू राजपूत पठानकोट, होशियारपुर और गुरदास पुर जिले में बसे है। दर्शी के मुताबिक उनके संगठन की शाखाएं और पदाधिकारी दूसरे जिलों में भी है और अब इसमें विवाद नहीं रह गया है। राजपूत समुदाय से जुड़े कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं ने भी इस विवाद को सुलझाने में भूमिका निभाई।
पठानकोट के एसएसपी विशाल सोनी ने कहा कि पद्मावत जिले के चार थियेटर में दिखाई जाएगी। उन्होंने बताया था कि वह भरोसा दिला सकते हैं कि यहां पर कोई दिक्कत नहीं होगी।
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विशाल सोनी ने कहा, ‘किसी ने फिल्म का विरोध नहीं किया है, ना ही हमें किसी हंगामे की आशंका है, यहां तक कि राजपूत समुदाय के नेताओं ने इसे देखने के बाद फिल्म की तारीफ की है। पठानकोट के कांग्रेस से जुड़े एक स्थानीय पार्षद योगेन्दर ठाकुर प्रसाद ने कहा कि प्रशासन ने राजपूत समुदाय को फिल्म दिखाकर उनका विश्वास जीत लिया है। अब सभी गलत धारणाएं दूर हो गईं हैं। उन्होंने कहा, ‘हम सुझाव देते हैं कि देश भर के राजपूत सदस्यों को यह फिल्म देखनी चाहिए क्योंकि इसमें राजपूताना गर्व को दिखाया गया है, फिल्म में रानी पद्मावती के चरित्र से किसी किस्म की छेड़छाड़ नहीं की गई है उन्हें और भी गौरवान्वित किया गया है। बता दें कि विवादों के बीच फिल्म पद्मावत आज रिलीज हो रही है।
इतिहास में आम है पद्मावती की यह कहानी
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| 12वीं-13वीं सदी के दौरान दिल्ली सल्तनत का बादशाह अलाउद्दीन खिलजी रानी पद्मावती की सुंदरता की कहानी सुनकर बेकरार हो गया था और रानी की एक झलक पाने के लिए अपनी सेना के साथ चितौड़गढ़ कूच कर गया था। |
पद्मिनी उर्फ पद्मावती सिंहल प्रांत के राजा गंधर्वसेन और माता चंपावती की संतान थीं। कहा जाता है कि पद्मिनी के पास हीरामणी नाम का एक तोता भी था, जिसके साथ वह अक्सर संवाद किया करती थी। राजा गंधर्वसेन ने बेटी की शादी के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था, जिसमें हिन्दू राजाओं और राजपूतों को बुलाया गया था। इस स्वयंवर में चितौड़गढ़ के राजा रावल रतन सिंह ने एक छोटे प्रांत के राजा मलखान सिंह को पराजित कर पद्मिनी को हासिल किया था। पद्मिनी रतन सिंह की दूसरी पत्नी थीं। विवाह के बाद ये लोग चितौड़गढ़ लौट आए।
राजा रतन सिंह एक अच्छे शासक के साथ ही कला के संरक्षक भी थे, इसलिए उनके दरबार में कई तरह के लोग शामिल थे। उनके दरबार में राघव चेतन नाम का एक संगीतकार भी था। चेतन तंत्र-मंत्र भी जानता था, यह बात सभी से छुपी हुई थी लेकिन एक दिन उसे तंत्र-मंत्र करते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया गया। इसके बाद राजा रतन सिंह ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। कहा जाता है कि राजा ने उसके चेहरे पर कालिख भी पुतवा दी थी। इससे वह काफी नाराज था, उसने राजा से बदला लेने की ठान ली। इसलिए, चितौड़गढ़ से निष्कासन के बाद राघव चेतन अलाउद्दीन खिलजी के दिल्ली दरबार में पहुंच गया।
कैसे पद्मावती का दीवाना बना था अलाउद्दीन खिलजी
चित्तौड़गढ़ के राजा रतन सिंह के दरबार से भगाए जाने के बाद राघव चेतन ने दिल्ली जाकर अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में शरण ले ली थी और धीरे-धीरे वह सुल्तान के काफी करीब हो गया था। उसने इस दौरान रानी पद्मावती की सुंदरता की कहानियां अलाउद्दीन खिलजी को सुनाना शुरू किया। रानी के बारे में सुनकर सुल्तान उसे देखने के लिए बेकरार हो गया। इसके बाद वह एक दिन अपने सैनिकों को साथ लेकर चितौड़गढ़ के लिए प्रस्थान कर दिया। चितौड़गढ़ पहुंचकर अलाउद्दीन खिलजी ने सैनिकों समेत चितौड़गढ़ किले के पास डेरा डाल दिया और राजा को संदेशा भिजवाया कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तान रानी पद्मावती की एक झलक देखना चाहते हैं। इसके बाद वह दिल्ली लौट जाएंगे। खिलजी के इस संदेश से चितौड़गढ़ में खलबली मच गई, राजा रतन सिंह भी असहज हो गए क्योंकि राजपूतों की परंपरा के मुताबिक महिलाएं गैर मर्दों के सामने नहीं जा सकती थीं लेकिन राजा रतन सिंह को इस बात की भी आशंका थी कि अगर इनकार किया गया तो सुल्तान उनके राज्य पर आक्रमण कर देगा। इसलिए अपने राज्य और प्रजा को बचाने के लिए राजा रतन सिंह ने सुल्तान का प्रस्ताव मान लिया।
इधर रानी पद्मावती सुल्तान के आमने-सामने नहीं होना चाहती थीं। लिहाजा, शीशे का इस तरह प्रबंध किया गया कि सुल्तान रानी की छाया उसमें देख सके। कहा जाता है कि रानी की एक झलक देखकर अलाउद्दीन खिलजी रानी पर मोहित हो गया। उसने मन ही मन तय कर लिया कि वो रानी पद्मावती को लिए बिना दिल्ली नहीं लौटेगा। जब महल से सुल्तान अपने कैम्प की तरफ लौट रहा था, तब राजा कतन सिंह भी उसके साथ थे लेकिन छल-कपट से खिलजी ने राजा रतन सिंह को बंदी बना लिया। इसके बाद महल में संदेश भिजवाया कि अगर वे लोग अपने राजा को जिंदा देखना चाहते हैं तो रानी पद्मावती को उसके साथ दिल्ली जाने दिया जाय।
राजा रतन सिंह के राज्य में दो भरोसेमंद मंत्री थे- गोरा और बादल। इन लोगों ने योजना बनाई और सुल्तान को संदेशा भिजवाया कि रानी दिल्ली जाने को तैयार हैं। इसके अगले दिन करीब सौ पालकी में बैठकर सैनिक खिलजी के कैम्प तक पहुंच गए और कहा कि पालकियों में रानी पद्मावती अपनी सेविकाओं के साथ दिल्ली कूच कर रही हैं। कैम्प के पास पहुंचते ही सैनिकों ने खिलजी की सेना पर हमला कर दिया और राजा रतन सिंह को छुड़ा लिया। लेकिन खिलजी वहां से जाने को तैयार नहीं था। उसकी सेना ने चितौड़गढ़ जाने वाली पानी, रसद की सप्लाई रोक दी। कई दिनों तक किले में लोग भूखे-प्यासे रहे।
अंतत: राजपूतों ने और राजा रतन सिंह ने तय किया कि भूखे मरने से बेहतर है कि लड़ते हुए ही जान न्यौछावर किया जाए। इसके बाद चित्तौड़गढ़ और दिल्ली सल्तनत के बीच युद्ध हुआ, जिसमें राजा रतन सिंह की हार तय दिख रही थी। इधर, महल में रानी पद्मावती और अन्य राजपूत रानियों ने अलाउद्दीन की गुलामी से बचने और राजपूत धर्म निभाते हुए जौहर होने का फैसला किया। कहा जाता है कि रानी पद्मावती ने महल के बीचों-बीच चिता सजाई और सबसे पहले खुद उसमें कूदीं। उसके बाद अन्य रानियों ने भी चिता में कूदकर अपनी जान दे दी। अंत में जब राजा रतन सिंह को मारकर जब अलाउद्दीन खिलजी किले में प्रवेश किया तो वहां उसे सिर्फ राख मिला, कुछ और नहीं। जिसकी चाह में उसने खून बहाए, वो बेकार गया।


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