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जम्मू-कश्मीर: सर्वाधिक राष्ट्रपति शासन वाला प्रदेश

अगस्त में अमरनाथ यात्रा खत्म होने तक राज्यपाल बने रह सकते हैं वोहरा, इसी महीने तक था कार्यकाल, national news in hindi, national newsजम्मू-कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी‌) और भाजपा की गठबंधन सरकार गिरने के 24 घंटे के अंदर राज्यपाल शासन लगा दिया गया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बुधवार सुबह इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने की मंजूरी दी। इससे पहले मंगलवार शाम को राज्यपाल एनएन वोहरा ने राज्यपाल शासन लगाने के लिए राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजी थी। वोहरा का कार्यकाल इसी महीने खत्म हो रहा है। लेकिन बताया जा रहा है कि वे अमरनाथ यात्रा खत्म होने तक गवर्नर बने रह सकते हैं। अमरनाथ यात्रा 28 जून से 26 अगस्त तक चलेगी।
राज्य में पिछले 10 साल में यह चौथी बार राज्यपाल शासन लगा है। पीडीपी और भाजपा के बीच सवा तीन साल पहले गठबंधन हुआ था। भाजपा ने मंगलवार को पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से गठबंधन तोड़कर महबूबा मुफ्ती सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। कांग्रेस और पीडीपी ने एकदूसरे के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार किया है। वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने भी किसी गठबंधन की संभावना से इनकार किया है।
जम्मू-कश्मीर में अब तक 11 चुनाव हुए, राज्य ने 8 बार राज्यपाल शासन देखा
कब-कब लगा राज्यपाल शासन
पहला26 मार्च, 1977 से 9 जुलाई 1977
दूसरा6 मार्च 1986 से 7 नवंबर 1986
तीसरा19 जनवरी 1990 से 9 अक्टूबर 1996
चौथा18 अक्टूबर 2002 से 2 नवंबर 2002
पांचवां11 जुलाई 2008 से 5 जनवरी 2009
छठा8 जनवरी 2015 से 1 मार्च 2015
सातवां7 जनवरी 2016 से 4 अप्रैल 2016
आठवां20 जून 2018 से लागू
1957-1977 :पहली बार 1957 में चुनाव। नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) को 75 में 68 सीट मिली। बख्शी गुलाम मो. वजीर-ए-आजम बने। 62 में भी नेकां जीती। 1967-72 में कांग्रेस जीती। 1975 में इंदिरा का नेकां के शेख अब्दुल्ला से करार हुआ। कांग्रेस के मीर कासिम ने अब्दुल्ला के लिए कुर्सी छोड़ दी।
1977-1982 :1977 में कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर अब्दुल्ला सरकार गिराई। पहली बार राज्यपाल शासन लगा। 1977 के चुनावों में नेकां जीती और शेख अब्दुल्ला दोबारा मुख्यमंत्री बनाए गए। 1982 में शेख अब्दुल्ला के निधन पर बेटे फारूक अब्दुल्ला सीएम बने। कांग्रेस की मदद से अब्दुल्ला के बहनोई गुलाम शाह ने सरकार गिरा दी। शाह दो साल सीएम रहे। 6 मार्च, 1986 से 7 नवंबर, 1986 तक राष्ट्रपति शासन रहा।
1986-2002 : 1986 में हुए चुनावों में फिर नेकां जीती और फारूख सीएम बने। 1990 में जगमोहन को राज्यपाल बनाने के विरोध में इस्तीफा दे दिया। 1996 तक राज्यपाल शासन रहा। 1996 के चुनाव में फिर नेशनल कॉन्फ्रेंस को सफलता मिली। फारूख तीसरी बार सीएम बने।
2002-2018 :2002 चुनाव में कांग्रेस-पीडीपी की सरकार बनी। मुफ्ती सईद सीएम बने। 3 साल के बाद कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद सीएम बने। पीडीपी ने सरकार गिरा दी। 2008 में हुए चुनावों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। नेकां-कांग्रेस की सरकार बनी। उमर अब्दुल्ला सीएम बने। 2014 में चुनाव हुए। 2015 में भाजपा-पीडीपी में गठबंधन। पीडीपी के मुफ्ती सईद फिर सीएम बने। उनके निधन के बाद महबूबा राज्य की पहली महिला सीएम बनी।
गठबंधन तोड़ने की दो वजह जो भाजपा ने बताईं : राम माधव ने कहा, ‘‘घाटी में आतंकवाद, कट्टरपंथ, हिंसा बढ़ रही है। ऐसे माहौल में सरकार में रहना मुश्किल था। रमजान के दौरान केंद्र ने शांति के मकसद से ऑपरेशंस रुकवाए। लेकिन बदले में शांति नहीं मिली। जम्मू और कश्मीर क्षेत्र के बीच सरकार के भेदभाव के कारण भी हम गठबंधन में नहीं रह सकते थे।’’
मतभेद की दो असल वजहेंपहली- रमजान के दौरान सुरक्षाबल आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन रोक दें, इसे लेकर भाजपा-पीडीपी में मतभेद थे। महबूबा के दबाव में केंद्र ने सीजफायर तो किया लेकिन इस दौरान घाटी में 66 आतंकी हमले हुए, पिछले महीने से 48 ज्यादा। ऑपरेशन ऑलआउट को लेकर भी भाजपा-पीडीपी में मतभेद था। दूसरी- पीडीपी चाहती थी कि केंद्र सरकार हुर्रियत समेत सभी अलगाववादियों से बातचीत करे। लेकिन, भाजपा इसके पक्ष में नहीं थी।

इनसाइड स्टोरी: भाजपा को पता था अक्टूबर तक सरकार गिरा देगी पीडीपी, अमित शाह ने देशहित के नाम पर पहले दांव चला, national news in hindi, national newsभाजपा को पता था अक्टूबर तक सरकार गिरा देगी पीडीपी

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को संकेत मिल चुके थे कि ऑपरेशन आॅल आउट के विरोध में मानवाधिकार और मुस्लिम को मुद्दा बनाकर पीडीपी सितंबर-अक्टूबर तक सरकार गिरा सकती है। इसके बाद से भाजपा इस पर मंथन कर रही थी। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तमाम पहलू देखने के बाद देश की अखंडता और राष्ट्रवाद के नाम पर गठबंधन से हटने का फैसला किया। राज्य, खासतौर पर जम्मू में भाजपा- संघ कैडर में नाराजगी की रिपोर्ट शाह को मिली थी।
इनसाइड स्टोरी: भाजपा को पता था अक्टूबर तक सरकार गिरा देगी पीडीपी, अमित शाह ने देशहित के नाम पर पहले दांव चला, national news in hindi, national newsकैडर में ऊर्जा संचारित करने के लिए ऑपरेशन ऑल आउट तेज करने की रणनीति भी तैयार की गई है। रमजान में 300 ऐसे कट्टरपंथियों की लिस्ट बनाई गई है, जो युवाओं को आतंकवाद की ओर धकेल रहे हैं। भाजपा के एक नेता का कहना है कि ऑपरेशन में यूनीफाइड कमांड का मुखिया मुख्यमंत्री होता है। ऐसे में वह अड़चन बनतीं। ऐसे में गठबंधन तोड़कर राज्यपाल शासन में ऑपरेशन को अंजाम देने का फैसला किया। भाजपा का दावा है कि आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई में पीडीपी का पूरा सहयोग नहीं था। एक सूत्र ने बताया कि सितंबर-अक्टूबर में पीडीपी के फैसले के बाद ऑपरेशन ऑल आउट तेज करते तो बर्फबारी की वजह से दिक्कतें आतीं। लोकसभा चुनाव से पहले नतीजा भी नहीं मिलता।
भाजपा तीन स्तर पर नरम रही: 1)पत्थरबाजों से मुकदमे वापस लिए, ताकि मानवता और राजनीतिक दृष्टि से संदेश जाए कि भटके युवाओं को एक मौका दिया है। 2)वार्ताकार की नियुक्ति की। उन्होंने सभी पक्षों से बातचीत का बयान दिया और बाद में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इसे दोहराया। 3) रमजान में एकतरफा सीजफायर का एेलान। केंद्र सरकार इन फैसलों के जरिये कश्मीर मसले पर संवेदनशीलता दिखाना चाहती थी।
क्या है भाजपा की भविष्य की रणनीति:उपचुनाव में हार के बाद नाकाम सीजफायर से भाजपा-संघ कैडर में नकारात्मक संदेश का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी। ऐसे में आतंकवाद से समझौता नहीं करने का फैसला किया।

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