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सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप की शुरुआत इंदिरा गांधी ने की थी

ज्यूडीशियरी के लिए काला दिन- निकम; SC जजों के कदम पर 5 कानूनी जानकारों की राय, national news in hindi, national newsआज (जनवरी 12) सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायधीशों ने अचानक प्रेस कांफ्रेंस कर न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने का सफलता पूर्वक प्रयास किया गया है। अब इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सख्ती के कारण हुई बौखलाहट है या कुछ और। दरअसल जब किसी गन्दे और कूड़े से भरे घर में झाड़ू लगाई जाती है, तो धूल उड़ती है और यदि जब उसी गन्दगी को पानी से बहाया से जाने पर कीजड़ होती है, और कीजड़ पर चलने वाला संभल कर नहीं चला तो गिर जाता है और कई परिस्थितियों में गिरने वाले की हड्डी भी टूट जाती है। 
कुछ वर्षो से चर्चा रही थी कि "सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं रहा है", लेकिन किसी ने मुँह खोलने तो दूर आपस में चर्चा करने का साहस नहीं किया। और आज जो हुआ वास्तव में बहुत ही दुखद है। इन न्यायधीशों ने जो जनता के सम्मुख रखने का कोई औचित्य नहीं था। जो समस्या है उसे मुख्य न्यायधीश,प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, और महामहिम राष्ट्रपति के सम्मुख लेकर जानी थी। यह स्पष्ट रूप से किसी षड्यंत्र की ओर संकेत दे रहा है।
2019 चुनाव को सामने रख वर्तमान सरकार को कटखडे में खड़ा करने की साज़िश की जा रही है। प्रमाण देखिए, जब जनता को कानूनी विवाद हल करने है, फिर कोर्ट में जनता क्या करने जाती है :--
 राजनीति शुरू 

‘जजों का कदम आसाधरण, न्यायपालिका में गहरा संकट’

इधर, सीपीआई नेता डी. राजा ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चेलमेश्वर से मुलाकात की है. मुलाकात के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) के नेता डी. राजा ने जस्टिस चेलमेश्वर से मुलाकात के बाद कहा कि जजों द्वारा उठाया गया कदम असाधारण है, और यह न्यायपालिका के गहरे संकट को दर्शाता है.
उन्होंने कहा कि जस्टिस चेलमेश्वर के साथ रिश्ता बहुत पुराना है. वे अपनी चिंताएं मेरे साथ बांटते हैं. अगर उनकी कुछ चिंताएं हैं, तो सांसदों को इस मामले पर विचार करके उसका हल ढूंढ़ने की जरूरत है.

न्यायपालिका में केंद्र की दखलअंदाजी खतरनाक: ममता

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट को लेकर हुई जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर दुख जताया है. उन्होंने कहा कि कोर्ट के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के चार जजों से मिली जानकारी ने देश के एक नागरिक के रूप में हमें निराश किया है.
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और मीडिया लोकतंत्र के खंभे हैं. लोकतंत्र के लिए न्यायपालिका में केंद्र सरकार की दखलअंदाजी खतरनाक है.
हालांकि, मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जजों की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सरकार ने दूरी बनाई हुई है. यही नहीं, ममता बनर्जी और राजनीतिक पार्टी संबंधित वकीलों को छोड़ दें तो कांग्रेस और बीजेपी समेत किसी भी पार्टी के नेता ने अभी तक प्रतिक्रिया नहीं दी है.
राजनीति खेलने वाले इन्दिरा गाँधी के कार्यकाल में जब न्यायपालिका में दखल दिया जा रहा था, उस समय किसी की हिम्मत नहीं हुई, शायद तत्कालीन इन्दिरा जो खेल खेल रही थी, इन लोगो के अनुरूप काम कर रही थी और आज सत्ता परिवर्तन ने इन सब के खेलों पर पानी फेरना शुरू कर दिया है। 
कोर्ट में हस्तक्षेप इंदिरा गाँधी से हुई थी
न्यायपालिका को अब अपनी प्रतिष्ठा वापस लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी होगी. वैसे न्यायपालिका में हस्तक्षेप की शुरुआत इंदिरा गांधी के समय में ही शुरू हुई थी. उन्होंने तीन वरिष्ठ जस्टिस जेएम सीलट, केएस हेगड़े और एएन ग्रोवर को पीछे कर जस्टिस एएन रे को सुप्रीमकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया था. उस वक़्त इसकी जमकर आलोचना भी हुई थी. ऐसे में न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह उसी वक़्त लग गया था. खंडपीठों में शासन करने वालों की मर्जी से नियुक्तियां होती थीं और हो रही हैं. यह कांग्रेस सरकार के समय शुरू हुआ था और भारतीय जनता पार्टी के समय में भी जारी है.
आपातकाल के दौरान लगे दाग 
आपातकाल के दौरान न्यायपालिका झुक गई थी और इसे वैध करार दिया कि संसद संविधान में दर्ज मौलिक अधिकारों को स्थगित कर सकती है. यहां तक कि आपातकाल थोपने को भी उचित बताया. सिर्फ एक जज, जस्टिस एचआर खन्ना ने विरोध में फैसला दिया, लेकिन उनसे जूनियर को पद्दोन्नति दे दी गई. यह अलग बात है कि देश के लोगों ने उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी को सजा दी. चुनाव होने पर उन्हें पूरी तरह बाहर कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका को बदनाम करने के इस फैसले की आलोचना के लिए न कोई प्रस्ताव पास किया या न ही कुछ और कदम उठाया.
फैसले के लिए सजा दी गई 
इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान एक लाख लोगों को बिना सुनवाई के हिरासत में रखा था. उस समय के तत्कालीन एटार्नी जनरल नीरेन डे ने अदालत में दलील दी थी कि आपातकाल के अंधकार भरे दिनों में जीवन का अधिकार भी छीन लिया गया था. इतना ज्यादा भय था कि दिल्ली के करीब सभी वकीलों ने आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की. मुंबई के एक वकील सोली सोराबाजी और दिल्ली के वीएम तारकुंडे ने बंदी प्रत्यक्षीकरण के लिए बहस की. दो जजों, जस्टिस एस रंगराजन और जस्टिस आरएन अग्रवाल को इस फैसले के लिए सजा दी गई. पहले उनकी गुवाहाटी बदली कर दी गई जहां लोग उनकी निष्पक्षता को  अभी भी याद करते हैं. दूसरे का पद नीचे कर दिया गया और उन्हें सत्र न्यायालय में भेज दिया गया.

जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर कानूनी जानकारों की राय

सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने शुक्रवार को सीजेआई के कामकाज के तरीकों पर सवाल उठाए। SC के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब उसके ही सिटिंग जजों ने मीडिया में अपनी बात रखी। इस पर सीनियर वकीलों और रिटायर्ड जजों ने रिएक्शन दिए। उज्ज्वल निकम ने इसे ज्यूडिशियरी के लिए काला दिन बताया। हालांकि, जजों के इस कदम पर ज्यूडिशियल सिस्टम से जुड़े कुछ लोग उनके समर्थन में भी दिखे। इन लोगों ने कहा- जजों के इस फैसले की कोई तो गंभीर वजह होगी।
1) केटीएस तुलसी
- सीनियर एडवोकेट और संविधान के जानकार केटीएस तुलसी ने कहा, ''यह बेहद चौकाने वाला है। इसके पीछे कोई ठोस वजह हो सकती है। जिसकी वजह से उन्हें इस तरह अपनी बात रखनी पड़ी। जब वे बोल रहे थे तो हर कोई उनके चेहरे पर दर्द साफ देख सकता था।''
2) इंदिरा जयसिंह
- सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कहा, ''ये एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। बहुत अच्छी तरह से हुई। देश की जनता को यह जानने का हक है कि ज्यूडिशियरी में क्या चल रहा है। मैं इसका स्वागत करती हूं।''
- ''प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले 4 जज चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ नहीं हैं। इनका मकसद है कि कैसे इंस्टीट्यूशन को और मजबूत बनाया जाए। जैसा उन्होंने कहा कि वे कोर्ट जाएंगे और पहले की तरह काम करेंगे।''
ज्यूडीशियरी के लिए काला दिन- निकम; SC जजों के कदम पर 5 कानूनी जानकारों की राय, national news in hindi, national news3) उज्ज्वल निकम

- सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने कहा, ''यह ज्यूडिशियरी के लिए काला दिन है। यह प्रेस कॉन्फ्रेंस खराब मिसाल साबित होगी। आज के बाद हर आम नागरिक सभी ज्यूडिशियल ऑर्डर को संदेह के तौर पर देखेगा। हर फैसले पर लोग सवाल उठाएंगे।''
4) रिटायर्ड जस्टिस आरएस. सोढ़ी
- रिटायर्ड जस्टिस आरएस सोढ़ी ने कहा, ''मुझे लगता है कि चारों जजों के खिलाफ महाभियोग लाया जाना चाहिए। उनके पास वहां काम करने और फैसले देने के अलावा कोई काम नहीं है। इस तरह से यूनियन बनाना गलत है। ये कहने की जरूरत नहीं है कि लोकतंत्र खतरे में है। हमारे पास संसद, कोर्ट और पुलिस सिस्टम है।''
- ''यह कोई मुद्दा नहीं है। जजों ने एडमिनिस्ट्रेटिव प्रॉसेस को लेकर शिकायत की है। वे सिर्फ 4 हैं, सुप्रीम कोर्ट में 23 जज और भी हैं। 4 जज एक साथ होकर सीजेआई पर आरोप लगा रहे हैं। यह अपरिपक्व और बचकाना व्यवहार है।''
5) रिटायर्ड जस्टिस मुकुल मुदगल

- हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज मुकुल मुदगल ने कहा, ''इसके पीछे कोई गंभीर कारण होना चाहिए। जब उनके पास प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता न बचा हो। लेकिन क्या जस्टिस लोया केस से इसका कनेक्शन है? मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता और किसी राजनीतिक मुद्दे पर कमेंट नहीं करना चाहता ।''
6) सुब्रमण्यम स्वामी
- बीजेपी नेता और सीनियर वकील सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा, ''हम उनकी (जजों) की आलोचना नहीं करते। बड़े ईमानदार व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपनी लीगल करियर की भेंट चढ़ाई है। हमें उनका सम्मान करना चाहिए। प्रधानमंत्री तय करें कि सुप्रीम कोर्ट के चारों जज, सीजेआई और पूरा कोर्ट एक राय बनाकर आगे काम करे।''
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सोचकर देखिए जरा, खेल किसका रचा हुआ है,
जो सुप्रीम कोर्ट के जजों में हड़कंप मचा हुआ है।
चौबीस जजों में से चार जजों को तकलीफ हुई,
क्या इसीलिए मीडिया का दरबार सजा हुआ है।
मीडिया के सामने आकर भी खुलकर बोले नहीं,
और बात करते हैं कि उनका ज़मीर बचा हुआ है।
मन में मेरे उठ रहे हैं चंद सवाल जरा गौर करना,
क्या कहना चाहते हैं, सुप्रीम कोर्ट बिका हुआ है।
क्यों नहीं मिले वो जाकर महामहिम राष्ट्रपति से,
लोकतंत्र के पिता का दर्जा जो उन्हें मिला हुआ है।
मुख्य न्यायाधीश को है अधिकार सविंधान पीठ का,
हर बिंदु का ज्ञान है उन्हें, जो जो वहां लिखा हुआ है।
राजनीतिक षड्यंत्र की बू आ रही है उनकी बातों से,
उन माननीयों के इस आचरण से देश हिला हुआ है।
क्यों नहीं आर्टिकल 124(4) के तहत कारवाई हो,
उनके कारण न्याय से आज विश्वास उठा हुआ है।
क्यों नहीं जज जाँच एक्ट 1968 के तहत जांच हो,
जो उन्होंने किया, ऐसा देश में पहली दफा हुआ है।
ये तकलीफ के विरुद्घ नहीं, अहम की लड़ाई लगी,
आज आम आदमी सोच रहा, क्या वो ठगा हुआ है।
राजनैतिक रोटियां सेंकनी शुरू कर दी नेताओं ने,
वोट बैंक अपना बढ़ाने का जो चश्का लगा हुआ है।
इंतजार के अलावा जनता कर भी क्या सकती है,
सच बाहर आएगा सुलक्षणा जो आज दबा हुआ है।
©® डॉ सुलक्षणा की वॉल से
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जस्‍टिस चेलामेश्‍वर के नाम पर अमेरिकी प्रांत में मनता है एक दिवस

कॉलेजियम सिस्‍टम की आलोचना करने वाले सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्‍ठ जज जस्टिस जस्‍ती चेलामेश्‍वर एक बार फिर से सुर्खियों में हैं। इस बार वह भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के कामकाज पर सार्वजनिक तौर पर अंगुली उठाकर चर्चा में आए हैं। जस्टिस चेलामेश्‍वर ने राष्‍ट्रीय न्‍यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) का समर्थन कर सभी को हैरत में डाल दिया था। असंतुष्टि का झंडा बुलंद करने वाले जस्टिस चेलामेश्‍वर आंध्र प्रदेश के कृष्‍णा जिले के रहने वाले हैं। उन्‍हें वर्ष 1995 में राज्‍य का अतिरिक्‍त महाधिवक्‍ता नियुक्‍त किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के जज को आंध्र के पूर्व मुख्‍यमंत्री एनटी. रामाराव का प्रशंसक माना जाता है, लेकिन चंद्रबाबू नायडू के कमान संभालने के कुछ दिनों बाद ही उन्‍हें अहम पद मिला था। कानून के क्षेत्र में उनके उल्‍लेखनीय योगदान को देखते हुए अमेरिकी प्रांत इलिनॉय का नैपरविले शहर 14 अक्‍टूबर को ‘जस्‍ती चेलामेश्‍वर दिवस’ घोषित कर चुका है।
सात साल पहले पहुंचे सुप्रीम कोर्ट : कानूनी क्षेत्र में प्रतिष्‍ठा हासिल करने के बाद जस्टिस चेलामेश्‍वर को हाई कोर्ट का जज नियुक्‍त किया गया था। कॉलेजियम सिस्‍टम के बदौलत ही वह मई, 2007 गौहाटी हाई कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश बने थे। लेकिन, अक्‍टूबर, 2011 तक वह सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंच सके थे। ऐसे में वरिष्‍ठता क्रम में वह देश के मौजूदा सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा से पिछड़ गए थे। जस्टिस चेलामेश्‍वर आने वाले कुछ महीनों में रिटायर होने वाले हैं।
बड़े मामलों की सुनवाई की: जस्टिस चेलामेश्‍वर ने कई बड़े मामलों की सुनवाई की है। इनमें प्रणब मुखर्जी के राष्‍ट्रपति बनने को चुनौती, व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता (श्रेया सिंघल केस), एनजेएसी, आधार और जजों को घूस देने जैसे बड़े और विववादास्‍पद मामले शामिल हैं। जस्टिस चेलामेश्‍वर की पीठ ने ही आधार से जुड़े मामले को व्‍यापक प्रभाव वाला बताते हुए संविधान पीठ के हवाले किया था। उन्‍होंने एनजेएसी का समर्थन किया था। सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार इसे असंवैधानिक करार दे दिया था। जजों को घूस देने से जुड़े मामलों को लेकर वह फिर से सुर्खियों में आ गए थे। मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्‍यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले को अपने पास लेकर सुनवाई के लिए अलग पीठ गठित कर दी थी। सीजेआई ने इस मामले पर जस्टिस चेलामेश्‍वर की पीठ में सुनवाई से महज कुछ दिनों पहले ही नई व्‍यवस्‍था दे दी थी।
कॉलेजियम सिस्‍टम के आलोचक: जस्टिस चेलामेश्‍वर कॉलेजियम सिस्‍टम के मुखर आलोचकों में से एक हैं। वह वर्ष 2016 में इस मामले पर बुलाई गई जजों की बैठक में शामिल नहीं हुए थे। उन्‍होंने लिखित में अपनी प्रतिक्रिया दी थी। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठता क्रम में जब वह दूसरे नंबर पर पहुंचे तो कॉलेजियम की सिफारिशों को सार्वजनिक करने का फैसला ले लिया गया।
साहित्‍य में रुचि: जस्टिस चेलामेश्‍वर की कानून के अलावा तेलगु साहित्‍य में भी बहुत रुचि है। वह इसका श्रेय मछलीपटनम स्थित अपने स्‍कूल को देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठ जज एक बेहतरीन पाठक भी हैं। यही वजह है कि उन्‍होंने अपने क्‍लर्क और युवा वकीलों के लिए लाइब्रेरी खोल दी है। वह युवा के अलावा वरिष्‍ठ अधिवक्‍ताओं को भी पूरी गंभीरता से सुनते हैं। बताया जाता है कि कोर्ट में वकीलों की दलीलें सुनते वक्‍त उनकी मुद्रा एनटी. रामाराव की तरह हो जाती है।



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